अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। गर्भ में बच्चे के दिल की गड़बड़ियों की पहचान संभव है, फिर भी हृदय रोग से पीड़ित 2.1 लाख बच्चे हर वर्ष उपचार से वंचित हैं। इसका प्रमुख कारण जांच सुविधा का हर जगह उपलब्ध न होना और जागरूकता की कमी है।
बाल हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की अचानक होने वाली मौत का एक कारण ऐसे आनुवंशिक हृदय रोग भी हैं, जिनमें सामान्य दिखाई देने वाले बच्चे की दिल की धड़कन व्यायाम या तनाव में अचानक जानलेवा हो जाती है।
गर्भ में जांच
मैक्स अस्पताल पटपड़गंज की बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मिली रे के अनुसार फीटल इकोकार्डियोग्राफी से गर्भ में ही बच्चे के हृदय और उसकी बनावट में मौजूद विकारों का पता लग जाता है। अभिभावक को इसकी जानकारी देकर प्रसव व जन्म के बाद उपचार की तैयारी की जा सकती है। एम्स की पूर्व प्रो. डा. अनीता सक्सेना के अनुसार देश में हर वर्ष दो लाख से अधिक बच्चे हृदय रोग के साथ पैदा होते हैं। इनमें से हर पांचवें बच्चे को जन्म के पहले वर्ष में ही उपचार की आवश्यकता होती है।
आनुवंशिक दिक्कत
डॉ. मिली रे के अनुसार आनुवंशिक बीमारियों में दिल की धड़कन को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था में गड़बड़ी हो जाती है, इससे व्यायाम या तनाव में धड़कन का बहुत तेज और अनियमित होने का खतरा रहता है। कुछ बच्चों में दिल की मांसपेशियां सामान्य से अधिक मोटी या कमजोर होने लगती हैं जो दिल के काम करने की क्षमता को प्रभावित करती है।
ब्रुगाडा सिंड्रोम (दिल की धड़कन को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था में गड़बड़ी) और डब्ल्यूपीडब्ल्यूपीडब्ल्यू सिंड्रोम (दिल में धड़कन का संकेत पहुंचने का अतिरिक्त रास्ता बन जाना) भी ऐसी ही समस्याएं हैं।
बेहोशी, सीने में दर्द को न करें नजरअंदाज
व्यायाम के दौरान या तुरंत बाद बेहोशी, दौरे जैसी स्थिति, सीने में दर्द, सांस फूलना और अचानक तेज धड़कन को नजरअंदाज करना बड़ा खतरा है। परिवार में कम उम्र में मृत्यु, तैरते समय डूबना, आनुवंशिक हृदय रोग या बहरापन इसके संकेत हैं। डॉ. मिली रे के अनुसार अचानक मृत्यु का तात्कालिक कारण हृदय और सांस की क्रिया रुकना हो सकता है पर, मूल कारण जानने के लिए सिर की चोट, छाती पर चोट, तंत्रिका तंत्र और फेफड़ों की बीमारियों की भी जांच जरूरी है।

