विजया पाठक
शराब, रेत और खनन के अवैध कारोबार पर लगाम लगाने में मोहन सरकार हुई नाकाम
मध्यप्रदेश में खाकी वर्दी एक बार फिर निशाने पर है। जिस वर्दी के कंधों पर प्रदेश की साढ़े आठ करोड़ जनता की सुरक्षा का दायित्व है, जब उसी वर्दी को अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करना पड़े तो कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देवास जिले के खातेगांव में थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत ने एक बार फिर प्रदेश में सक्रिय अवैध कारोबार और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। यह केवल एक पुलिस अधिकारी की मौत नहीं, बल्कि कानून के सामने खड़ी उस चुनौती का संकेत है, जिसमें अवैध कारोबार से जुड़े लोग कार्यवाई रोकने के लिए जानलेवा कदम उठाने तक से नहीं हिचक रहे हैं। घटना 02 नवंबर 2026 की है। अवैध शराब तस्करी की सूचना पर खातेगांव थाना प्रभारी दिलीप पुरी पुलिस टीम के साथ इंदौर-बैतूल हाईवे पर जांच के लिए पहुंचे थे। इसी दौरान एक संदिग्ध ट्रक को रोकने की कोशिश में वह उसकी चपेट में आ गए। गंभीर चोटों के कारण उनकी मौत हो गई। इस ट्रक में अवैध शराब ले जाई जा रही थी। इस घटना ने प्रदेश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
*खाकी पर हमलों का पुराना सिलसिला*
मध्यप्रदेश में अवैध खनन, रेत परिवहन और शराब तस्करी के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। मुरैना में आईपीएस नरेंद्र कुमार सिंह की मौत, छिंदवाड़ा में एएसआई देवेंद्र नगाले की हत्या, गुना में पुलिसकर्मियों की मौत और शहडोल में एएसआई महेंद्र बागरी की जान जाना ऐसे मामले हैं, जिन्होंने समय-समय पर व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया है। 2012 से अब तक अवैध खनन और शराब परिवहन के खिलाफ कार्रवाई के दौरान सात सरकारी कर्मचारियों की जान गई, जिनमें चार पुलिसकर्मी शामिल थे। इन घटनाओं को महज अलग-अलग आपराधिक वारदात मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आखिर राज्य सरकार इनके पीछे छिपे नेटवर्क, आर्थिक हितों और स्थानीय स्तर पर मिलने वाले संभावित संरक्षण की जांच करने में अब तक क्यों विफल साबित हो रही है। सवाल यह है कि जब किसी इलाके में अवैध कारोबार लगातार फलता-फूलता है तो क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं होती? यदि जानकारी होती है तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं होती? और यदि कार्रवाई होती है तो उसे अंजाम देने वाले अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा क्यों नहीं मिलती?
*माफिया का दुस्साहस या व्यवस्था की कमजोरी?*
प्रदेश में कभी रेत माफिया की गतिविधियां चर्चा में रहती हैं तो कभी अवैध खनन, शराब तस्करी और शिक्षा के नाम पर चल रहे संगठित कारोबार की शिकायतें सामने आती हैं। स्कूलों में मनमानी फीस और नियमों के उल्लंघन के आरोप हों या खदानों में अवैध उत्खनन का मामला, हर जगह प्रशासन की जिम्मेदारी का सवाल उठता है। लेकिन परिणाम कुछ नहीं सामने आते, समस्या जस की तस बनी हुई है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब किसी अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचे अधिकारी को ही अपनी जान गंवानी पड़ जाए। आखिर अपराधियों के मन में कानून का भय इतना कमजोर कैसे पड़ जाता है कि वे पुलिस की मौजूदगी में भी कानून को चुनौती देने का दुस्साहस कर लेते हैं? क्या केवल कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी से इस समस्या का समाधान हो जाएगा? जब तक अवैध कारोबार की आर्थिक जड़ों और उसके पूरे नेटवर्क पर चोट नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा।
*मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जवाबदेही के सवाल*
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास गृह विभाग की भी जिम्मेदारी है। ऐसे में प्रदेश की कानून-व्यवस्था और पुलिस बल की सुरक्षा को लेकर उनकी जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जीरो टॉलरेंस की नीति की बात करती रही है, लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा है। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। माफियाओं के हौंसले बुलंद हैं। मरने-मारने का भय माफियाओं के दिमाग से निकल गया है।
*कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाएगा मामला?*
मध्यप्रदेश में कानून का राज केवल सरकारी घोषणाओं और पुलिस की वर्दी से कायम नहीं होता। इसके लिए अपराधियों के मन में कानून का भय और जनता के मन में सुरक्षा का विश्वास होना जरूरी है। पुलिसकर्मी जब किसी तस्कर को रोकने के लिए सड़क पर उतरता है तो उसके पीछे शासन और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की ताकत होनी चाहिए। यदि वह अकेला पड़ जाता है तो यह केवल पुलिस विभाग की नहीं, बल्कि शासन की विफलता है। मोहन सरकार को यह भरोसा देना होगा कि ईमानदारी से ड्यूटी करने वाले किसी भी पुलिसकर्मी को अपराधियों के सामने असहाय नहीं छोड़ा जाएगा। कुल मिलाकर देवास के टीआई दिलीप पुरी की मौत को एक और घटना बनाकर भुला देना सबसे बड़ी भूल होगी। यह मध्यप्रदेश की कानून-व्यवस्था, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने खड़ा बड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब माफियाओं पर कार्यवाही कर उनके नेटवर्क को ध्वस्त करके देना होगा।

