ट्रंप-शी की वार्ता के बीच भारत का 'मल्टी-अलाइनमेंट' दांव, दोनों महाशक्तियों से कैसे साधेगा तालमेल?

ट्रंप-शी की वार्ता के बीच भारत का 'मल्टी-अलाइनमेंट' दांव, दोनों महाशक्तियों से कैसे साधेगा तालमेल?
संजय कुमार भारद्वाज: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों देश रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन खुलकर टकराव से बचना चाहते हैं। दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आपूर्ति शृंखला, दुर्लभ खनिज और प्रौद्योगिकी के स्तर पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पिछले साल अक्टूबर में दक्षिण कोरिया के बुसान में शी और डोनाल्ड ट्रंप की बैठक के बाद बनी व्यापार व्यवस्था इसका उदाहरण है। चीन अमेरिकी तकनीक और बाजार पर निर्भर है, जबकि अमेरिका दुर्लभ खनिजों की चीनी आपूर्ति पर। इसलिए दोनों के लिए संबंध तोड़ना महंगा है।

स्थिरता चाहिए: चीन एशिया की प्रमुख शक्ति बन चुका है, लेकिन अभी इतना ताकतवर नहीं हुआ कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को द्विध्रुवीय बना सके। उसकी महत्वाकांक्षा बड़ी है, पर क्षमता अब भी अधूरी। इसलिए वॉशिंगटन से टकराव उसके लिए जोखिम भरा है। पेइचिंग फिलहाल टकराव से बचते हुए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। शी ने मई में संबंधों को रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता बताया था। दोनों देशों पर घरेलू आर्थिक दबाव भी है। ऐसे में व्यापार, तकनीक और प्रभाव की प्रतिस्पर्धा जारी रखते हुए संबंध स्थिर रखना दोनों के हित में है।टकराव की वजह: अमेरिका-चीन के बीच टकराव बढ़ाने वाले तीन मुद्दे हैं। पहला, ईरान युद्ध। दोनों चाहते हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हो और होर्मुज स्ट्रेट खुल जाए, लेकिन चीन के ईरान से करीबी व्यापारिक संबंध इस सहमति को सीमित करते हैं। दूसरा मसला ताइवान का है। दिसंबर 2025 में अमेरिका ने 11.1 अरब डॉलर के आठ हथियार सौदों की सूचना कांग्रेस को दी। शी इसे द्विपक्षीय संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं, जबकि वाइट हाउस के तथ्य-पत्र में इसका उल्लेख नहीं है। तीसरा मुद्दा रूस-यूक्रेन युद्ध है। चीन-रूस और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकी से अमेरिकी दबदबे को चुनौती मिलती दिखती है।संगठनों का इस्तेमाल: चीन सीधे टकराव के बजाय मौका भुनाकर अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत करना चाह रहा है। वह SCO और BRICS के जरिए प्रभाव बढ़ा रहा है, जहां ईरान और रूस जैसे अमेरिका-विरोधी देशों के साथ भारत जैसी तटस्थ शक्तियां भी हैं। पेइचिंग इन मंचों से औपचारिक गठबंधन के बिना यथास्थिति बदलने की कोशिश कर रहा है। BRICS में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं पर सहयोग इसकी मिसाल है। इसके जवाब में अमेरिका क्वाड के जरिए चीन का प्रभाव सीमित करना चाहता है।

अविश्वास बढ़ा: अमेरिका की टैरिफ नीति ने भारत समेत कई देशों के साथ अविश्वास बढ़ाया है। टैरिफ के जरिए दबाव बनाने की ‘कैरेट एंड स्टिक’ नीति ने हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी रणनीति को कमजोर किया है। अमेरिकी प्रतिबद्धताओं को लेकर सहयोगी देशों में अनिश्चितता बढ़ी है।
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