सत्य निकेतन में 5 मंजिला PG बिल्डिंग गिरने के बाद दिल्ली में नगर निगम की कार्रवाई ने समस्या का बड़ा पैमाना सामने रखा है। 1 जून से 9 सितंबर के बीच दिल्ली नगर निगम ने 1,053 प्रॉपर्टी को गिराने की कार्रवाई की और 491 प्रॉपर्टी को सील किया। इस दौरान 2,316 कारण बताओ नोटिस और 757 डिमोलिशन नोटिस जारी किए गए। 7 से 9 सितंबर के बीच 1,252 PG बिल्डिंग का सर्वे भी किया गया।
गाजियाबाद में बढ़ती असुरक्षित इमारतें
दिल्ली से सटे गाजियाबाद की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। यहां 150 से ज्यादा इमारतों को असुरक्षित या खतरनाक घोषित किया जा चुका है। 2018 में यह संख्या 26 थी, जो 2020 में बढ़कर 102 हो गई। तुलसी निकेतन की जर्जर कॉलोनी में आज भी 500 से ज्यादा लोग रह रहे हैं। यहां 220 LIG फ्लैट, 2,004 EWS फ्लैट और 60 दुकानें हैं। सवाल यह है कि जब किसी इमारत को असुरक्षित घोषित कर दिया गया हो तो वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?नोएडा में सालों से असुरक्षित इमारतों पर अब नोटिस
सत्य निकेतन हादसे के बाद नोएडा अथॉरिटी ने उन 56 इमारतों को खाली कराने के लिए नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की, जिन्हें कई साल पहले जर्जर और असुरक्षित घोषित किया गया था। 2018 में शाहबेरी में इमारत गिरने के बाद हुए सर्वे में 56 जर्जर इमारतों समेत 1,757 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए थे। हालांकि सिर्फ इमारत खाली कराना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक आवास, पुनर्वास और मरम्मत या पुनर्निर्माण की स्पष्ट समयसीमा भी जरूरी है।चेन्नई और नवी मुंबई में भी हालात चिंताजनक
यह समस्या दिल्ली-NCR तक सीमित नहीं है। चेन्नई में 2025 के सर्वे में 337 जर्जर इमारतों की पहचान हुई, जिनमें ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन की 130 इमारतें शामिल थीं। नगर निकाय ने मानसून से पहले निरीक्षण की योजना बनाई है और स्ट्रक्चरल सेफ्टी की जांच के लिए IIT मद्रास, अन्ना यूनिवर्सिटी या PWD की मदद लेने की बात कही है। नवी मुंबई में भी इस साल की शुरुआत में 500 से ज्यादा इमारतों को रहने के लिए असुरक्षित घोषित किया गया था।नई इमारतें भी नहीं पूरी तरह सुरक्षित
सुरक्षा का खतरा केवल दशकों पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं है। मुंबई में बिना मंजूरी किए गए बदलावों और कॉमन एरिया के इस्तेमाल में बदलाव पर भी कार्रवाई हुई है। मंजूर नक्शे से अलग निर्माण या बिना अनुमति के स्ट्रक्चरल बदलाव नई इमारतों की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकते हैं।अगले हादसे का इंतजार क्यों?
2020 से 2024 के बीच भारत में इमारत गिरने, आग लगने और गड्ढों या मैनहोल में गिरने जैसी घटनाओं में करीब 33,000 लोगों की मौत होने का सरकारी आंकड़ों के हवाले से दावा किया गया है। इनमें बड़ी संख्या शहरी इलाकों की बताई गई है। ऐसे में चुनौती सिर्फ हादसे के बाद कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि उससे पहले खतरे को पहचानने की है।- शहरों को नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट, अवैध निर्माण की शुरुआती स्तर पर रोकथाम, इमारतों के इस्तेमाल में अनधिकृत बदलाव की निगरानी और समयबद्ध रीडेवलपमेंट की जरूरत है।
- सत्य निकेतन की घटना को सिर्फ एक हादसा मानकर छोड़ देना समस्या का समाधान नहीं होगा। यह उन तमाम इमारतों के लिए चेतावनी है, जहां खतरा सामने दिखाई देने के बावजूद लोग आज भी रहने को मजबूर हैं।
