मौलाना शहाबुद्दीन रजवी अक्सर फतवा जारी करने के लिए सुर्खियों में रहते हैं। वे बरेली स्थित ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। हाल ही में इन्होंने 2 और फतवे जारी किए। एक हिंदू युवक के मुस्लिम सरनेम लगाने पर आपत्ति जताई।
क्या राजनेता, क्या अभिनेता और क्या आम आदमी…किसी को भी नहीं बख्शा। वो कहते हैं- मुसलमानों को इस्लाम के उसूलों के खिलाफ नहीं जाना चाहिए। जो भी शरीयत को नहीं मानेगा, उसे तौबा करनी होगी।
1 नवंबर- मौलाना ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर फतवा जारी कर दिया। वजह, उन्होंने कश्मीरी हिंदू पत्रकार निधि राजदान से निकाह किया। इसको शरीयत के खिलाफ बताया।
31 अक्टूबर- उत्तराखंड के दीपक कुमार को लेकर आपत्ति जताई। वजह, एक स्थानीय विवाद के बाद उन्होंने अपने नाम के आगे ‘मोहम्मद’ लगा लिया था। दीपक मुसलमान नहीं हैं, इसलिए फतवा नहीं लगाया।
29 अक्टूबर- बॉलीवुड एक्ट्रेस सारा अली खान के खिलाफ फतवा जारी किया। वह केदारनाथ धाम गई थीं। वहां पूजा-अर्चना और दर्शन किया था।
मौलाना दर्जनों बड़े नेता, फिल्मी सितारों और मशहूर चेहरों के खिलाफ फतवा जारी कर चुके हैं। वो दावा करते हैं कि कई लोग मेरे फतवे को मानकर इस्लाम के हिसाब से चलने लगे। जो नहीं मान रहा, उसे खुदा के सामने जवाब देना होगा।
ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं- आखिर फतवा होता क्या है? इसको जारी करने का हक किसे है? जिनके खिलाफ फतवा जारी होता है, क्या नहीं मानने पर कोई धार्मिक सजा भी मिलती है? पढ़िए ये रिपोर्ट…
‘उमर अब्दुल्ला-निधि राजदान की शादी इस्लाम में नाजायज’
दैनिक भास्कर ने मौलाना शहाबुद्दीन से पूछा- उमर अब्दुल्ला-निधि राजदान का निकाह नाजायज कैसे हुआ? वो कहते हैं- इस्लाम में निकाह की पहली शर्त है कि लड़का और लड़की, दोनों मुसलमान हो। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तो मुस्लिम हैं, लेकिन निधि राजदान कश्मीरी हिंदू हैं।
उमर को चाहिए था कि वह जिससे शादी कर रहे हैं, उसे पहले इस्लाम कबूल करवाते। कलमा पढ़वाते और फिर निकाह करते। तभी यह निकाह शरीयत की रोशनी में जायज होता।
इसके बाद वो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई पूरी कर सकते थे। उन्होंने इस्लाम के उसूलों को दरकिनार करके सीधे मैरिज एक्ट अपनाया, जो इस्लाम में मान्य नहीं है। ये भी है कि अगर वो मुस्लिम नहीं होते, तो हम कोई हुक्म भी नहीं देते।
मौलाना बोले- सारा अली गुनहगार, वो खुदा से तौबा करें
हमने मौलाना से पूछा- मंदिर में पूजा-पाठ भी गुनाह है? वह कहते हैं- इस्लाम में किसी गैर-मजहब के धार्मिक स्थल पर जाकर पूजा करना या जल चढ़ाना जायज नहीं है। इस्लाम में खुदा के साथ किसी और को शरीक करना सबसे बड़ा गुनाह माना गया है। सारा अली गुनहगार हैं और उन्हें खुदा से तौबा करनी चाहिए।
‘गैर-मुस्लिम अपने नाम में 'मोहम्मद' नहीं जोड़ सकता’
उत्तराखंड के मोहम्मद दीपक कुमार को लेकर भी चर्चा थी कि उनके खिलाफ फतवा जारी हुआ है। हालांकि, मौलाना ने इसे खारिज करते हुए कहा कि फतवा केवल मुसलमानों पर लागू होता है, गैर-मुस्लिम पर नहीं।
लेकिन, उन्होंने नाम पर आपत्ति जताते हुए कहा- पैगंबर मोहम्मद साहब का नाम है। इसकी अपनी गरिमा है। किसी भी गैर-मुस्लिम को अपने नाम के आगे मोहम्मद लिखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्हें अपनी मूल पहचान के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए।
मौलाना बोले- जिसमें ईमान, वो फतवे का अमल करेगा
मौलाना से पूछा गया कि क्या उनके फतवे को कोई मानता भी है? अगर न माने तो क्या सजा का प्रावधान है? वह कहते हैं- हमारे अधिकार में किसी पर कार्रवाई करना नहीं है। हम केवल शरीयत का हुक्म बताते हैं। जो लोग गलत करते हैं, उन्हें खुदा के सामने जवाब देना होगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा- कानपुर में सपा विधायक नसीम सोलंकी के मंदिर जाने पर फतवा दिया गया था। इसके बाद उन्होंने फतवे का सम्मान करते हुए तौबा की थी।
कश्मीर की एक मशहूर महिला के खिलाफ भी फतवा जारी किया था, शरीयत का हुक्म बताया था, उन्होंने माना और तौबा की।
फतवा कौन जारी कर सकता है, सही प्रक्रिया क्या है…
इसे समझने के लिए दैनिक भास्कर ने राष्ट्रीय उलेमा संसद के अध्यक्ष डॉ. मौलाना कल्बे रुसैद रिजवी से बात की। डॉ. कल्बे रुसैद ने बताया कि शिया और सुन्नी दोनों में फतवा जारी करने का अलग-अलग नियम है।
सुन्नी समुदाय: फतवा जारी करने का अधिकार 'मुफ्ती' को होता है।
शिया समुदाय: शिया परंपरा में 'मर्जा' (जो इस्लामिक स्टडीज के सर्वोच्च स्तर पर होते हैं) फतवा जारी कर सकते हैं।
‘बिना मांगे फतवा जारी करना सही नहीं’
नेशनल उलेमा पार्लियामेंट के प्रेसिडेंट डॉ. कल्बे रुशैद रिजवी ने मौलाना शहाबुद्दीन द्वारा जारी फतवों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा- शरीयत के हिसाब से फतवा तब दिया जाता है, जब कोई अपनी किसी समस्या या सवाल को लेकर फतवा मांगता है। जब उमर अब्दुल्ला या सारा अली खान ने कोई फतवा मांगा ही नहीं, तो खुद से जारी करने का कोई मतलब नहीं बनता।
उन्होंने कहा कि केदारनाथ में कई मुस्लिम काम करते हैं। वहां आते-जाते रहते हैं। ऐसे में बिना किसी मांग के हर बात पर फतवा जारी करना सही परंपरा नहीं है।
फतवे को लेकर देश का कानून क्या कहता है?
भारत के कानून के अनुसार फतवे की कोई कानूनी मान्यता या बाध्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी साफ कर चुका है कि फतवा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकता। न ही इसे जबरन लागू कराया जा सकता है। ये सिर्फ एक धार्मिक राय या सलाह है, जिसे मानना या न मानना पूरी तरह से संबंधित व्यक्ति पर निर्भर करता है।
यूपी में तीसरी बार भाजपा सरकार बनेगी या सपा का सितारा बुलंद होगा, यह तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन सोशल मीडिया पर पोस्ट को लाइक, शेयर और कमेंट किए जाने यानी इंगेजमेंट के मामले में सपा, यूपी भाजपा से आगे है।

