लेकिन ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान डील बहुत अलग मायने रखता है। इससे भारत को मध्य एशिया में अपनी पैठ बनाने में मदद मिली है क्योंकि ये क्षेत्र पहले रूस हथियारों का खरीददार था और पिछले कुछ सालों से चीन वहां हथियारों की सप्लाई कर रहा था लेकिन अब दो बड़े मध्य एशिआई देशों ने भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम पर भरोसा जताया है। भारतीय रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पिछले गुरुवार को इन नई बिक्री की पुष्टि की है। उन्होंने 'आकाश' को 'हमारी सफलताओं में से एक' बताते हुए यह भी संकेत दिया कि कुछ और देशों में भी इसको लेकर गहरी दिलचस्पी है।
युद्ध में अपनी क्षमता साबित कर चुका है आकाश एयर डिफेंस सिस्टम
- भारतीय रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह 100 मीटर से 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक हवाई लक्ष्यों को भेद सकती है और इसकी ऑपरेशनल रेंज 4.5 किलोमीटर से 25 किलोमीटर है।
- 5.87 मीटर लंबी हर मिसाइल का वजन लगभग 710 किलोग्राम है और यह लक्ष्यों को लॉक करने के लिए कमांड गाइडेंस का इस्तेमाल करती है।
- 'आकाश' प्रोग्राम को 'आकाश प्राइम' और 'आकाश-NG' जैसे नए वर्ज़न के साथ अपडेट भी किया गया है जिनमें बेहतर सेंसर और अन्य सुधार शामिल हैं। आर्मेनिया पहले से ही आकाश सिस्टम को ऑपरेट करता है।
उन्होंने कहा 'तुर्कमेनिस्तान पहले ही कई चीनी एयर-डिफेंस सिस्टम हासिल कर चुका है और उम्मीद है कि 'आकाश' उसके एयर-डिफेंस आर्किटेक्चर में मिड-लेयर की भूमिका निभाकर उन्हें और बेहतर बनाएगा।' कुमार ने कहा कि रूस के लिए भारत का मध्य एशियाई डिफेंस मार्केट में आना शायद उस स्थिति से बेहतर है जिसमें यह इलाका नाटो या चीनी मिलिट्री स्टैंडर्ड्स के करीब चला जाए।
चीन की पश्चिमी सीमा के पास कैसे पहुंच रहे भारतीय हथियार
अतुल कुमार ने ये भी कहा कि चीन की पश्चिमी सीमा के पास भारतीय मिलिट्री हार्डवेयर की मौजूदगी बीजिंग के लिए अच्छी बात नहीं होगी खासकर इसलिए क्योंकि वह खुद को इस इलाके में पसंदीदा मिलिट्री सप्लायर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। कुमार ने कहा 'भारत अलग-अलग पॉलिसी पहलों, इंसेंटिव और डिफेंस कॉरिडोर के जरिए डिफेंस एक्सपोर्ट को बढ़ावा दे रहा है और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ा रहा है।'रूस से अपनी निर्भरता क्यों घटा रहे मध्य एशियाई देश?
यूक्रेन युद्ध ने रूस की हथियार बेचने की क्षमता को गंभीर रूप से कम कर दिया है। हालांकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के डेटा से पता चलता है कि क्रेमलिन अभी भी मध्य एशिया में हथियारों का मुख्य सप्लायर बना हुआ है लेकिन देश तेजी से दूसरे विकल्पों की तरफ जा रहे हैं। चीन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है खासकर उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान में।इंस्टीट्यूट के डेटा के मुताबिक 2020 और 2024 के बीच रूस के हथियारों के कुल एक्सपोर्ट का 11 प्रतिशत हिस्सा कज़ाकिस्तान ने खरीदा जबकि ताजिकिस्तान अभी भी रूसी उपकरणों और सैन्य मदद पर काफी हद तक निर्भर है। वहीं दूसरी तरफ आर्मेनिया रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता तेजी से कम कर रहा है और भारत और फ्रांस जैसे नए सप्लायर्स की ओर रुख कर रहा है।
