होर्मुज स्ट्रेट के साथ-साथ लाल सागर में भी तनाव बढ़ा है। इसका असर सप्लाई पर साफ दिख रहा है। फिजिकल मार्केट में ज्यादा दबाव दिख रहा है। इससे सप्लायर्स को प्रीमियम वसूलने का मौका मिल रहा है और भारतीय रिफाइनर गल्फ से सप्लाई पाने के लिए महंगे स्पॉट मार्केट की ओर रुख कर रहे हैं।
प्रीमियम की मांग
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक रिफाइनरी से जुड़े एग्जीक्यूटिव ने कहा, "हर ट्रेडर प्रीमियम मांग रहा है।" उदाहरण के लिए गल्फ सप्लायर्स रीजनल दुबई-ओमान बेंचमार्क से $3-4 प्रति बैरल ज्यादा कीमत मांग रहे हैं जबकि यह बेंचमार्क खुद ब्रेंट से $6-7 प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है।उन्होंने कहा कि इससे भारतीय रिफाइनरों के लिए गल्फ के कच्चे तेल की प्रभावी लागत ब्रेंट से लगभग $10 प्रति बैरल ज्यादा हो जाती है। कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर की तेजी से भारत का आयात बिल सालाना करीब 2 अरब डॉलर यानी 18,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।
एग्जीक्यूटिव्स ने कहा कि सऊदी अरामको द्वारा अलग-अलग ग्रेड के लिए तय आधिकारिक बिक्री कीमतें बहुत ज्यादा राहत नहीं देती हैं, क्योंकि लाल सागर और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावटों के कारण टर्म-डील सप्लाई कम हो गई है। भारतीय रिफाइनर गल्फ के कच्चे तेल के लिए तेजी से स्पॉट मार्केट का रुख कर रहे हैं, जहां ट्रेडर्स प्रीमियम मांग रहे हैं।
कहां से तेल मंगा रहा है भारत?
इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स ने कहा कि ये ट्रेडर्स मुश्किल समुद्री रास्तों से कार्गो ले जाने में ज्यादा जोखिम उठा रहे हैं और इस अतिरिक्त जोखिम के लिए प्रीमियम वसूल रहे हैं। साथ ही वेस्ट अफ्रीकन कच्चे तेल के लिए भी प्रीमियम बढ़ गए हैं। भारतीय रिफाइनर खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई में कमी को पूरा करने और महंगे होते वेस्ट अफ्रीकन ग्रेड से बचने के लिए अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे सप्लायर्स से ज्यादा कच्चा तेल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।रूसी तेल खरीदने वालों पर अमेरिकी प्रतिबंध और कड़े होने से भारतीय रिफाइनरों के लिए कच्चा तेल खरीदना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी सीनेट ने हाल ही में एक बिल पास किया है जिसमें भारत, चीन और रूसी तेल खरीदने वाले अन्य देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की बात कही गई है। ऐसे कदमों से ग्लोबल सप्लाई में और रुकावट आ सकती है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
