PTI की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी विदेश विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वॉशिंगटन भारत को ऊर्जा का एक बड़ा सप्लायर बनना चाहता है। पिछले हफ्ते ट्रंप ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' पर दस्तखत किए थे। इस कानून के तहत भारत और चीन समेत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
भारत की चेतावनी के बाद अमेरिका झुका?
अमेरिका के सौ फीसदी टैरिफ वाले कानून पर नई दिल्ली ने पहले ही अपनी चिंता जाहिर कर दी थी। विदेश मंत्रालय ने कहा कि हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ वरिष्ठ स्तर पर यह मुद्दा उठाया गया था और भारत ने साफ कर दिया था कि इस कानून का दोनों देशों के रिश्तों और बड़े एनर्जी मार्केट पर क्या असर पड़ सकता है।इसके साथ ही वॉशिंगटन ने खुद को एक वैकल्पिक सप्लायर के तौर पर पेश किया। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी विदेश विभाग के एक सीनियर अधिकारी ने कहा 'हम भारत की एनर्जी ज़रूरतों को पूरा करने का एक बड़ा जरिया बनना चाहते हैं। हम अपने हाइड्रोकार्बन एक्सपोर्ट को बढ़ा रहे हैं।'
अधिकारी ने इस पेशकश को भारत की एनर्जी सोर्स में विविधता लाने की लंबे समय से चल रही कोशिशों से जोड़ा। उन्होंने कहा 'मांग बहुत ज्यादा है और तेल की जरूरतें भी हैं। हम विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन मैं यह कहूंगा कि युद्ध से पहले भी भारत लंबे समय से एनर्जी के मामले में विविधता लाने की कोशिश कर रहा था। यह कोई नई बात नहीं है। हमें बस इस प्रक्रिया को और तेज करने की जरूरत है।' उन्होंने आगे कहा टभारत लंबे समय से अपने एनर्जी सोर्स में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी एनर्जी की जरूरतें बहुत ज्यादा हैं।'
भारत के कड़े रुख के बाद बैकफुट पर अमेरिका!
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि कांग्रेस के इस मुद्दे पर कड़ा सार्वजनिक रुख अपनाने के बाद नई दिल्ली की प्रतिक्रिया समझ में आती है। अधिकारी ने कहा 'कांग्रेस के सदस्यों ने खास तौर पर भारत की आलोचना की इसलिए जाहिर है कि भारत को जवाब देना ही था। हम यह समझते हैं। उनके अपने घरेलू समर्थक हैं जैसे हमारे हैं। ऐसी किसी भी गतिविधि को लेकर कोई नाराजगी नहीं है।'भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले कहा था 'हाल के महीनों में अमेरिका के अलग-अलग प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। भारत ने बहुत साफ तौर पर बताया है कि इसके न सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी क्या असर पड़ सकते हैं।'
