उन्होंने लिखा है कि 2020 के बाद खासकर 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद और ग्रीस और साइप्रस जो तुर्की के पुराने दुश्मन रहे हैं उनके साथ बढ़ते रिश्तों के जरिए पूर्वी भूमध्य सागर में नई दिल्ली की बढ़ती सक्रियता के कारण तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी अरब-बांग्लादेश का यह नया रणनीतिक गठजोड़ कई तरह की चुनौतियां पेश करता है। हालांकि उनका ये कहना पूरी तरह सही नहीं है। भारत ने जरूर ग्रीस और साइप्रस से सैन्य संबंध बनाए हैं लेकिन ऐसा पाकिस्तान को तुर्की की मदद मिलने के बाद शुरू किया गया है।
बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है तुर्की?
बांग्लादेश को अगर तुर्की पाकिस्तान और सऊदी वाले सैन्य गठबंधन में शामिल करता है तो भारत को थोड़ी बहुत परेशानी हो सकती है। तुर्की जरूर भारत की रणनीतिक घेराबंदी करने की कोशिश करेग। लेकिन ऐसा करना उसके लिए अत्यंत मुश्किल होगा और जितने संसाधन की जरूरत उसे होगी उतना जुटाना तुर्की के लिए संभव नहीं है। उन्होंने लिखा है कि ढाका ने पारंपरिक रूप से भारत, अमेरिका और चीन जैसी बड़ी ताकतों के साथ संबंध बनाकर रणनीतिक संतुलन बनाए रखा है।लेकिन घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक दबाव और सुरक्षा सहयोगियों में विविधता लाने की इच्छा ने बांग्लादेश को दूसरे विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है। पाकिस्तान के साथ उसके बढ़ते संबंध इसी विविधता का प्रमाण हैं। हालांकि बांग्लादेश अभी मक्का समझौते का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है लेकिन इसमें शामिल होने की उसकी इच्छा यह दर्शाती है कि वह भारत जैसे अपने करीबी और मित्र पड़ोसी देशों पर पारंपरिक निर्भरता से परे सुरक्षा सहयोग की संभावनाओं को तलाशने को तैयार है।
यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से मक्का फ्रेमवर्क से जुड़ता है चाहे पर्यवेक्षक या भागीदार के रूप में ही क्यों न हो तो इससे प्रभावी रूप से तुर्की की रणनीतिक उपस्थिति भारत की पूर्वी सीमा तक पहुंच जाएगी जो इस क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ मौजूदा साझेदारी को और मजबूत करेगी।
