फ्रांस में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों के विरोध में शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। फ्रांस 24 की रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी पेरिस में राष्ट्रपति भवन एलिजे पैलेस से महज 400 मीटर दूर प्रदर्शनकारियों ने हिंसक प्रदर्शन किया और गाड़ियों में आग लगा दी। करीब 12 सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
वहीं, लिमोज शहर में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने टाउन हॉल में आग लगा दी। इससे 143 साल पुरानी इमारत लगभग पूरी तरह तबाह हो गई। देश के कई हिस्सों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी रही।
फ्रांस में करीब एक महीने से प्रदर्शन चल रहे हैं। शुरुआत स्कूली छात्रों के विरोध से हुई थी, जो धीरे-धीरे सामाजिक आंदोलन में बदल गया है।
प्रदर्शनकारियों की 4 अहम मांगें…
- वेतन और पेंशन बढ़ाना
- महंगाई कम करना
- सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाना
- स्कूलों में शिक्षकों की कमी और जर्जर इमारतों को ठीक करना
एक छोटे से स्कूल से शुरू हुआ आंदोलन, देशभर में फैला
- 21 सितंबर को पेरिस के लाइसी सेंट-एक्सूपेरी स्कूल के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। यह स्कूल ऐसे इलाके में है जहां बेहद गरीब लोग रहते हैं। छात्रों की मांग थी कि स्कूल में शिक्षकों और संसाधनों की कमी दूर की जाए।
- 29 सितंबर को प्रशासन ने स्कूल में अतिरिक्त स्टाफ भेजा जिसके बाद हड़ताल खत्म हो गई, लेकिन तब तक दूसरे इलाकों में भी विरोध शुरू हो चुका था। सिर्फ 8 दिन में आंदोलन 410 स्कूलों तक फैल चुका था।
- इसके बाद विश्वविद्यालयों के छात्र भी आंदोलन में शामिल हो गए। छात्रों को उनके माता-पिता, शिक्षकों और मजदूर संगठनों का भी समर्थन मिला।
- 5 अक्टूबर को उत्तरी फ्रांस के लेंस शहर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस के एक ग्रेनेड से 15 साल के एक लड़के का हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और उसे काटना पड़ा। इस घटना ने पुलिस की सख्त कार्रवाई को लेकर लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया
- फ्रांस में इससे पहले स्कूली छात्रों के किसी आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में हिंसक घटनाएं नहीं देखी गई थीं। अब तक देशभर में हुई झड़पों में 200 से ज्यादा छात्र, स्कूलों के 85 कर्मचारी और 700 पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं।
- अब तक 6,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें ज्यादातर नाबालिग थे। बाद में उन्हें बिना किसी आरोप के रिहा कर दिया गया।
दुकानों में लूटपाट, कई शहरों में आगजनी
प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद युवकों के समूह सड़कों पर घूमते रहे। कुछ जगहों पर उनकी पुलिस से झड़प हुई, तो कई जगहों पर उन्होंने आग लगाई और बंद दुकानों में घुसकर सामान लूट लिया।
करीब 10 शहरों में सुपरमार्केट, दवा की दुकानों, महंगे ब्रांड के शोरूम, कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाली दुकानों में लूटपाट हुई।
न्यूज एजेंसी AFP के मुताबिक कुछ युवकों का समूह प्लानिंग के साथ दुकानों को निशाना बना रहे थे। वे चेहरे पर नकाब और हाथों में दस्ताने पहने हुए थे। दुकानों में घुसने से पहले वे सुरक्षा कैमरों के कनेक्शन काट देते थे और फिर शीशे तोड़कर अंदर घुस जाते थे।
मैक्रों ने शांति बनाए रखने की अपील की
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा करने वाले प्रदर्शनकारियों को धमकी दी। उन्होंने कहा कि सरकारी दफ्तरों और कारोबारों पर हमला करने, तोड़फोड़ करने या लूटपाट में शामिल लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें सजा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि टाउन हॉल जैसी सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ करने वालों को भी बख्शा नहीं जाएगा।
पीली जैकेट वाले आंदोलन की वापसी
इन प्रदर्शनों के पीछे 2018 के येलो वेस्ट आंदोलन की भी अहम भूमिका है। इस बार सोशल मीडिया पर लोगों से उसी आंदोलन को दोबारा शुरू करने की अपील की गई थी।
दरअसल 2018 में फ्रांस की सड़कों पर हजारों लोग पीले रंग की चमकदार जैकेट पहनकर उतर आए थे। तब सरकार तेल-गैस पर टैक्स बढ़ाने जा रही थी जिससे नाराज होकर लोग पीली जैकेट में सड़कों पर उतर आए थे।
पीली जैकेट ही विरोध का प्रतीक क्यों बनी?
फ्रांस में गाड़ी चलाने वालों के लिए पीले रंग की चमकदार जैकेट रखना जरूरी होता है। सड़क पर गाड़ी खराब होने या किसी आपात स्थिति में इसे पहनने से व्यक्ति दूर से दिखाई देता है।
प्रदर्शनकारियों ने इसी जैकेट को अपनी पहचान बना लिया। इसके बाद इस आंदोलन को फ्रेंच भाषा में ‘गिले जॉन’ और अंग्रेजी में ‘येलो वेस्ट’ कहा जाने लगा।
पुलिस को दक्षिणपंथी, प्रदर्शनकारियों को वामपंथी पार्टी का समर्थन
अगले साल अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए राजनीतिक पार्टियां इस आंदोलन के प्रति अपना रुख तय करने में जुटी हैं।
राष्ट्रपति पद की सबसे बड़ी दावेदार और दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने पुलिस का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि कट्टर वामपंथियों ने प्रदर्शनकारियों की मांगों को अपने कब्जे में ले लिया है।
वहीं, वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों ने कहा कि देशभर में ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि टीवी चैनल हिंसा की घटनाओं को बार-बार दिखाकर प्रदर्शनों की ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जैसे हर जगह हिंसा हो रही हो।



