नई दिल्ली। साफ और सुरक्षित पानी हर व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन क्या आप जानते हैं जिस पानी को आप सुरक्षित मानकर पी रहे हैं, उसमें मौजूद कमिकल की मात्रा नापने के नियम सालों पुराना हो चुके हैं?
जी हां, और इसी बारे में चिंता जताते हुए 85 स्वास्थ्य और पर्यावरण संगठनों ने यूनाइटेड नेशनल हेल्थ एजेंसी से पानी में नाइट्रे़ट की मात्रा से जुड़े नियमों को दोबारा रिव्यू करने की मांग की है। आइए जानें अभी इससे जुड़ा नियम क्या है और क्यों इसे फिर से रिव्यू करने की मांग की जा रही है।
1958 में बने थे पुराने नियम
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पीने के पानी में नाइट्रेट के स्वीकार्य स्तर को साल 1958 में तय किया गया था। इस नियम के मुताबिक, पानी में नाइट्रेट की सीमा 50 मिलीग्राम प्रति लिटर तय की गई थी। उस समय ये तय की गई मात्रा बच्चों में होने वाले ब्लू बेबी सिंड्रोम में ध्यान रखकर तय किए गए थे।
ब्लू बेबी सिंड्रोम एक खतरनाक स्थिति है, जिसमें ब्लड की ऑक्सीजन कैरी करने की क्षमता कम हो जाती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण त्वचा का रंग नीला पड़ने लगता है, जो जानलेवा भी साबित हो सकता है। हालांकि, पानी में नाइट्रेट की स्वीकार्य मात्रा काफी पुराने हैं और इनमें बदलाव की सख्त जरूरत है।
सेहत के लिए है बेहद खतरनाक
खेती के कारण पानी में घुलने वाला नाइट्रेट इंसानों के शरीर के लिए काफी खतरनाक माना जाता है, खासकर प्रेग्नेंट महिलाओं और बच्चों के लिए। हाल में हुई कई स्टडीज में ये सामने आया है कि लंबे समय तक पानी में तय स्वीकार्य मात्रा से कम नाइट्रेट लेवल भी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है।
पानी में तय सीमा से कम नाइट्रेट लेवल होने पर भी आंतों के कैंसर का खतरा रहता है। इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव का जोखिम भी काफी बढ़ जाता है। इसलिए पानी में नाइट्रेट के स्तर की सही मात्रा को फिर से तय करना काफी जरूरी है। आज दुनियाभर में करोड़ों लोग ऐसे पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें नाइट्रेट का स्तर काफी ज्यादा है।
नए नियमों की मांग
स्वास्थ्य और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि पुराने नियमों को आज के समय में भी मानते रहना लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने जैसा है। पिछले साल एक स्टडी में नाइट्रेट की सीमा को घटाकर 6.0 मिलीग्राम प्रति लीटर करने की मांग की गई थी, जो मौजूदा स्तर से 10 गुना कम है। ज्यादातर देश अपने पानी के स्टैंडर्ड अंतरराष्ट्रीय गाइड लाइन्स पर ही तय करते हैं। इसलिए ग्लोबल लेवल पर नियमों में सुधार जरूरी है।

