बांग्लादेश निचला तटवर्ती देश है और वो गंगा जल के बंटवारे पर अपना हक का दावा कर रहा है। वो 1996 के समझौते को रिन्यू नहीं बल्कि नये सिरे से समझौता करना चाहता है। इसके खिलाफ बांग्लादेश की दूसरी शर्त ये है कि तारिक रहमान तभी दिल्ली आएंगे जब भारत ये आश्वासन दे कि शेख हसीना भारत की जमीन से 'राजनीतिक गतिविधियां' नहीं करेंगी। बांग्लादेश ने बताया है कि ये दोनों मुद्दे उसके लिए सबसे अहम हैं और अगर इन दोनों पर भारत विचार करता है तभी तारिक रहमान इस साल नवंबर महीने में दिल्ली आएंगे।
बांग्लादेश ने क्यों रखा नई जल संधि का प्रस्ताव?
- दरअसल 17 सितंबर को ढाका में तारिक रहमान के दौरे को लेकर एक हाई-लेवल मीटिंग की गई है जिसमें कई मुद्दों पर चर्चा की गई है।
- भारत और बांग्लादेश के सीनियर डिप्लोमेट्स उसके बाद से लगातार संपर्क में है जिसमें तारिक रहमान के दौरे को अंतिम रूप देने की कोशिश की जा रही है।
- बांग्लादेश ने अपने विदेश सचिव असद आलम सियाम को नई दिल्ली में उच्चायुक्त बनाया है जो नवंबर के पहले हफ्ते में दिल्ली आ जाएंगे और उसके बाद तारिक रहमान का दौरा हो सकता है।
- ढाका की पानी की नई मांग 12 दिसंबर को गंगा जल बंटवारा संधि की 30 साल की अवधि खत्म होने के बाद आई है।
- बांग्लादेश अब मौजूदा व्यवस्था को 'सीधे आगे बढ़ाने' के बजाय एक नई संधि चाहता है। उसका तर्क है कि एक नए ढांचे में निचले बहाव वाले देश के तौर पर उसकी जरूरतों को बेहतर ढंग से शामिल किया जाना चाहिए।
- बांग्लादेश के मंत्री फरहाद हुसैन आजाद ने कहा था कि ढाका गंगा के पानी में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग करेगा जिसमें सूखे के मौसम में पानी के बहाव की मजबूत गारंटी भी शामिल है।
भारत-बांग्लादेश में गंगा जल को लेकर विवाद क्या है?
- भारत और बांग्लादेश के बीच 54 नदियां बहती हैं। लेकिन वर्तमान में सिर्फ गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर ही एक ठोस संधि है जो 1996 में की गई थी। तीस्ता समेत बाकी नदियों पर कोई स्थायी समझौता नहीं है।
- जब 'ट्रांसबाउंड्री वाटर गवर्नेंस' यानि सीमा पार जल प्रबंधन की बात आती है तो ढाका अब टुकड़ों में समझौते करने के बजाय एक व्यापक और दीर्घकालिक ढांचा चाहता है।
- ढाका चाहता है कि अलग-अलग नदियों पर बात करने के बजाय पूरे 'रिवर बेसिन' को आधार मानकर एक साझा ट्रीटी बने।
- जैसे सिंधु जल समझौते में नदियों को पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में बांट दिया गया था लेकिन भारत और बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति और डेल्टा क्षेत्र होने के कारण नदियों को इस तरह बांटना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल है।
- भारत अगर किसी नई और कठोर संधि में बंधता है तो इससे भविष्य में पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल में भारत के अपने हाइड्रो-पावर और सिंचाई प्रोजेक्ट्स पर कानूनी रोक लग सकती है।
