तमिलों का द्रविड़ राजनीति से मोहभंग क्यों होता है?

तमिलों का द्रविड़ राजनीति से मोहभंग क्यों होता है?
दक्षिणी राज्य तमिल में इस चुनाव में धूमकेतु की तरह उभरे नेता और लोकप्रिय ‍अभिनेता फिल्म अभिनेता जोसेफ विजय चंद्र थलपति विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कशघम (टीवीके) अनंत सरकार ने कम समर्थन वाले वेल्थ का दावा करने में सफल हो गए, लेकिन इस राज्य में द्रविड़ राजनीति की धुरी बने रहे इस राज्य में विजय और टीवीके का उदय क्या है? या विजय के रूप में यही नया राजनीतिक चेहरा अख्तियार रहेगा? तमिल का द्रविड़ राजनीति के मूल तत्व हैं जैसे कि सनातन हिंदू विरोध, हिंदी विरोध, आर्य और संस्कृत विरोध, ब्राह्मण विरोध, नास्तिक सेक हिंदूवाद, तमिल, संस्कृति को अति संवदेन भावना और जाति आधारित जातीयता के प्रबल समर्थन के फ़ोहो से मोह हो गई भाषा है या विजय का प्रतिष्ठित तमिल पहचान की धार्मिक शैली में संप्रदाय का नया और सांस्कृतिक चरण क्या है? तमिलों की युवा पीढ़ी अब अपने राज्य और संस्कृति को प्रमुख सिद्धांतों में देखने का आग्रह करती है? और क्या ऐसे में वहां बीजेपी के पैर फैलाने वाले लोग बन सकते हैं? ये वो अध्ययन प्रश्न हैं, जो इस बार तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से उभर रहे ह

तमिल में द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत बीसवीं सदी में सामाजिक और राजनीतिक सुधार के आग्रह, ब्राह्मणों के वर्चस्व और हिंदी मंचों के विरोध में हुई थी। अश्वारोही और छोटे पक्षों को एकजुट किया गया। परिणामस्वरूप 1967 के विधान सभा चुनाव में द्रविड़ मुनेत्र कशघम (शिक्षक) नेता अन्ना दुरई के नेतृत्व में पहली बार शिक्षक की सरकार बनी। अन्ना दुरई सर्वमान्य नेता थे, लेकिन दो साल बाद ही कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। फिर के. करुणानिधि पार्टी के नए नेता बने। इसके बाद डॉक्टरों की दुकान में ताला लगना शुरू हो गया। पार्टी के एक और नेता और लोकप्रिय अभिनेता एमजी. रामचन्द्रन ने पार्टी के हिसाब-किताब में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए जवाब मांगा तो शिक्षकों के नेतृत्व ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। 1972 में एमजीआर रामचन्द्रन (एमजीआर) ने अपनी नई पार्टी एआईए डियामके (ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कशगम) का निर्माण किया। इस पार्टी की असिस्ट भी वही थी, जो टीचर्स की थी। लेकिन इस पार्टी का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के हाथ में था। एमजीआर खुद की जाति मलयाली नायर जाति से थे। जबकि उनके ‍राजनीतिक शिष्या और बाद में मुख्यमंत्री ‍आदिवासी ब्राह्मण वादी थे। अध्यापिकाओं के अवगांठ मोटे तौर पर एओबीसी और दलित नेता रह रहे हैं। इस उदाहरण में एआईएडीमके ​​को टीचर्स की तुलना में 'सैफ़्ट ड्राइड पाॅलिटिक्स' करने वाली या आस्तिक सेक यूक्रेनवादी पार्टी माना जा सकता है। तमिल में द्वीप सामीरात से लेकर मित्र दो प्राणियों के बीच सत्य की अदला-बदली होती रहती है। उनका मुख्य कारण राजस्व वितरण और मुद्रास्फीति विरोधी है। तमिल की तीन पीढ़ियां इसी तरह के मराठा में पली-बढ़ी हैं। लेकिन जेन जी के मूलमंत्र में अब पहली बार बेहतर रोजगार, जीवन शैली, बाकी देशों और दुनिया से जुड़ाव की आकांक्षा और नई राजनीति की तलाश के आग्रह ने द्रविड राजनीति के गठबंधन को शामिल किया है। स्वयं विजय की पार्टी में कोई स्पष्ट असमानता नहीं है। ज्यादा से ज्यादा उन्हें सुशासन और बड़ी रेवड़ियां चमक का वादा करने वाली पार्टी माना जा सकता है। यद्यपि विजय द्रविड आंदोलन के मूल तत्वों से एकदम अलग तो नहीं जा सकता, लेकिन उसे बड़े पैमाने पर समावेशी बनाने का आग्रह अवश्य किया जा सकता है। उन्हें तो अभी अपना संगठन भी खड़ा करना है।

तो क्या तमिल में द्रविड आंदोलन का जोश अब उभर रहा है? सीमित अर्थ में इसका उत्तर 'हां' में हो सकता है। इसका बड़ा कारण यह है कि तमिलनाडु में सबसे अधिक लोकतंत्र पर रही और कुल जनसंख्या का प्रतिशत 2.5 प्रतिशत ब्राह्मण जाति राजनीतिक रूप से पूरी तरह से हाशिये पर है। बहुत से ब्राह्मणों ने तो अन्यत्र अपने आशियाने बसा के लिए तमिल को ठीक किया है। उद्यम में अधिकतर उन्हें टिकट भी नहीं मिलते। दूसरी, राज्य की सत्ता अब मोटे तौर पर पिछवाड़े की गाड़ी के हाथ में आ गई है। तीसरा, तमिल में सरकारी प्रकाशन में 69 प्रतिशत प्रतिशत 1969 में ही लागू हो गया था। इस कारण से वोडाफोन को अवसर का लाभ का लक्ष्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। ऐसे में आज बड़े पैमाने पर सभी प्रमुखों के युवा जातीय विभेदित और दलित सिंड्रोम से बाहर निकल कर खुद को राष्ट्रीय और वैश्विक विचारधारा में देखने लगे हैं। यही कारण है कि वहां के डेमोक्रेटों ने इस बार थलपति विजय की पार्टी के रूप में विविध राजनीति के विकल्प का चयन किया। यद्यपि घोर जातिवादी तत्व विजय के उदय को पचा नहीं पा रहे हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि तमिल अब द्रविड राजनीति से मुक्त हो गया है। इस चुनाव में द्रविड़ राजनीति के पुरोहितों का कुल वोट अभी भी 55.40 प्रतिशत है। खैर ही वो दो कार्टूनिस्ट में बँटा हो। अगर विक्ट्री की पार्टी को 'सेकुलर' मान लें तो उसे 34.92 प्रतिशत वोट मिला है, जो कि द्रविड राजनीति के उत्साह की तुलना में काफी कम है। इसके बावजूद अगर कांग्रेस ने खुद को सेक किया, तो वह राज्य में तीसरी ताकत के रूप में अपनी शोभा की भी छुट्टी देख रही थी। चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस चुनाव से पहले ही टीवी के साथ गठबंधन करना चाहती थी, लेकिन पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें रोकवा दिया।

हिंदुत्व की राजनीति करने वाली और विविधतापूर्ण राजनीति के बीच एआईएडीएमके के सहयोगी गठबंधन में शामिल भाजपा भी विजय के उदय से मन ही मन खुश है। भाजपा ने भी चुनाव के पूर्व विजय पार्टी से नरसंहार की कोशिशें की थीं, लेकिन विजय ने ही सांप्रदायिक ताकतों से मेल के कारण राजनीतिक क्षति की आशंका के चलते हाथ आगे नहीं बढ़ाया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिल में भारी जीत के बाद विजय की बधाई देने के लिए खुद फोन किया। इसमें भी कई संकेत संकेत हैं। अब देखिए यह है कि विजय किसका समर्थन लेते हैं। छोटी सेक मानवतावादी का या फिर किसी द्रव्यवादी पार्टी का? तमिलनाडु में पूर्व में सुपरमार्केट्स सुपरमार्केट्स ने तो केंद्र से मैड्रिड का रास्ता छोड़ दिया था। उन्होंने सनातनी कम्युनिस्ट, हिंदी और बीजेपी के खिलाफ़ खुली विचारधारा जंग छेड़ दी थी। जिसे चुनाव में तमिल जनता ने ही खारिज कर दिया। बेसबॉल के रूप में एम.के.स्टालिन का प्रसिद्ध होना सबसे बड़ा प्रमाण है।

अब सवाल यह है कि ‍थलपति विजय और उनकी पार्टी टीवीके किस रास्ते पर जीविका? थलपति ने चुनावी प्रचार के दौरान छात्रों को कुचलने की कोशिश की थी, क्योंकि शिक्षकों ने उनकी पार्टी में भ्रूण हत्या की कोशिश की थी। इसका अर्थ यह है कि वो कट्टर द्रव्यवाद से अलग लाइन पर चलेंगे। यही नहीं विजय को भी शक है कि उनकी हिंदू पत्नी ने अपनी अलग बात कहकर तलाक की अर्जी के पीछे भी टीचर्स की ही चाल चली थी। विजय स्वयं कैथोलिक ईसाई हैं, लेकिन उनके मां हिंदू हैं। उनकी मां ने धर्म नहीं बदला है और वो साईंबाबा के भक्त बताए गए हैं। ऐसे में विजय स्वयं को धर्मों के प्रति सदभाव का मार्ग अपना सकती है। विजय की मूल जाति क्या है, इसके बारे में कहा जाता है कि पूर्वज तमिलनाडु के प्रभावशाली वेल्लार समुदाय से थे, जो अपनी जाति में शामिल होते हैं।

यहां जर्नल में यह बात कही गई है कि आज तमिल में सभी प्रमुख वैश्विक नेतृत्व वाले एबीसी नेताओं के हाथ में है, फिर से वो स्टूडेंट के हो या एआईए मीडिया के। जबकि कांग्रेस का नेतृत्व एक दलित नेता के. सेल्वापेरूथैंगाई कर रहे हैं। विजय राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जो ईसाई हैं और जो प्रकार से लघुगणक जाति से आते हैं। राज्य में उनकी व्यापक कृतियों को उदार धार्मिक धार्मिक दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। विजय यदि राजनीति में समावेशी इलेक्ट्रानिक मार्गदर्शी घटक हैं तो इससे कट्टर द्रविड राजनीति में गिरावट आ सकती है। ताकि भविष्य में भाजपा और कुछ हद तक कांग्रेस के नये राष्ट्रवाद से उत्थान की जमीन तैयार हो सके। इसे कट्टर द्रव्यवाद>नास्तिक धर्मनिरपेक्षवाद>आस्तिक धर्मनिरपेक्षवाद>हिंदुत्व के कट्टर रूप में भी देखा जा सकता है। हालाँकि यह तत्काल होने की कोई संभावना नहीं है। क्योंकि प्रयासों के बाद भी भाजपा को तमिल में केवल 1 सीट मिली है। अलबत्ता पिछले विस चुनाव की तुलना में उसका वोट शेयर 0.35 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन बढ़त 4 से 1 रह गई।  
एक अर्थ में विक्ट्री डीवीडी डीवीडी को ही फेलो करेंगे और वो है रेवड़ी कलचर। बल्कि वो इस मामले में अपना भी एक कदम आगे बढ़ाते दिख रहे हैं, जिसका सीधा असर राज्य के सुझाव पर है। विजय के वाद्ययंत्रों को पूरा करने के लिए राज्य को 1 लाख करोड़ रु. की जरुरत होगी. विजय इस पर 'विजय' कैसे होती है, यह देखना होगा। 

अजयकिल, संपादक 

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