क्या अगले साल उत्तरप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले बड़े दलित नेता और चिंतक कांशीराम को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न मिल सकता है? देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू जीवित रहे होते तो क्या दलित कांशीराम को मुख्य मंत्री बनाते? कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लखनऊ में कांशीराम जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संविधान सम्मान कार्यक्रम’ में ये दो मुद्दे उठाकर जहां नई राजनीतिक खलबली मचा दी है, वहीं उनके इतिहास ज्ञान पर भी सवाल उठने लगे हैं। बड़ा सवाल यह है कि इस वक्त राहुल गांधी द्वारा कांशीराम को याद करने के पीछे कांग्रेस का असल सियासी मकसद क्या है? क्या पार्टी इस बहाने काफी पहले गंवा चुके दलित वोट को फिर से हासिल करने की जुगत में है? क्या इन बयानों का दलितों पर कांग्रेस के हित में सकारात्मक और भावनात्मक असर होगा? अपने भाषण में राहुल गांधी ने कांशीराम को सामाजिक न्याय का महान योद्धा और बहुजन चेतना का मार्गदर्शक बताते हुए उन्हें ‘भारत रत्नब’ देने की मांग की। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र में राहुल गांधी ने कहा कि कांशीरामजी ने भारतीय राजनीति की प्रकृति को बदला तथा बहुजनों और गरीबों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई। इसी कार्यक्रम में स्व. कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न देने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। यह भी कहा गया कि जब राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे तब ये सब काम होंगे।
राहुल के बयान को यूपी में विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस की तरफ से फेंका गया तगड़ा सियासी पासा माना जा रहा है। जिसकी गूंज सुनाई देने लगी है। इसने यूपी में मायावती, अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बेचैनी बढ़ा दी है। पहला रिएक्शन दलित नेता और यूपी की मुख्यिमंत्री रहीं मायावती की तरफ से आया। लखनऊ में ही कांशीराम जयंती के अवसर पर बसपा सुप्रीमो अध्यक्ष मायावती ने पलटवार करते हुए कहा कि जिस तरह कांग्रेस ने संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर को लंबे समय तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया, वैसी गलती भाजपा/एनडीए की केंद्र सरकार को नहीं करनी चाहिए। संविधान की भावना के अनुरूप समतामूलक समाज बनाने में मान्यवर कांशीरामजी का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने यह भी कहा कि दलित, पिछड़े और मुस्लिम समाज के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियां चुनाव के समय ही इन वर्गों और उनके महापुरुषों को याद करती हैं, जबकि सरकार बनने के बाद उनकी उपेक्षा कर दी जाती है। उधर भरतपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बसपा नेता आकाश आनंद ने राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांशीरामजी में नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की ताकत थी, न कि नेहरू उन्हें मुख्यमंत्री बनाते। कांशीरामजी ने खुद पद का लालच किए बिना प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनाए। आकाश ने सवाल किया कि जब कांशीरामजी का देहांत हुआ, तब केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक तक घोषित नहीं किया। कांग्रेस केवल दलितों का शोषण करती आई है। इस बीच बीजेपी ने प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि जब तक कांशीराम जीवित रहे, कभी कांग्रेस ने उन्हें सम्मान नहीं दिया। आज दलित वोट बैंक के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को तब भारत रत्न मिला, जब देश में जनता दल के नेतृत्व की सरकार बनी।
कांशीराम पंजाब के रहने वाले थे और रामदासी सिख थे। बहुत बाद में बौद्ध हो गए। लेकिन सामाजिक न्याय के तहत भारतीय राजनीति को उन्होंने जिस ढंग से बदला, उसका सर्वाधिक असर उत्तर प्रदेश और कुछ प्रभाव बिहार पर पड़ा। इसका मुख्य कारण यह है कि देश में दलितों की सर्वाधिक 20 फीसदी जनसंख्या यूपी में ही है और इसमें भी आधी आबादी उस जाटव जाति की है, जिसका प्रतिनिधित्व मायावती करती हैं। कांशीराम का मानना था कि लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल करके ही देश में सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है और जातीय भेदभाव खत्म किया जा सकता है। उन्होंने समाज के दबे-कुचले लोगों में यह आस न सिर्फ जगाई बल्कि उस पर अमल भी कर िदखाया कि वो भी सत्ता के शीर्ष पर बैठक सकते हैं। यूपी की धरती पर कांशीराम का नारा था- वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।‘ इस नारे ने तीन दशक पहले दलितों को कांग्रेस से दूर कर िदया। अब कांग्रेस को लगने लगा है कि जब तक दलित वोट उसके पाले में नहीं लौटता, तब तक राज्य में सत्ता में वापसी दिन का ख्वाब ही है। यह भी सच है कि कांशीराम और उनकी पार्टी के उदय के साथ ही यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस का सिमटना शुरू हो गया था, जो आज भी जारी है। बेशक, कांशीराम ने मंडल-कमंडल के दौर में भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दी तथा दलितों में सत्ता की भूख और आत्मविश्वास पैदा किया।
बहरहाल राहुल का यह बयान जहां दलितों को मायावती का दामन छो़ड़ कांग्रेस के साथ आने का साफ सिग्नल है, वहीं इसने मायावती को उस बीजेपी को घेरने पर भी विवश कर दिया है, जिसकी उन्हें बी’टीम कहा जाता है। यही नहीं, राज्य में पीडीए की बात करने वाले अखिलेश यादव के लिए भी राहुल का यह दांव चिंतित करने वाला है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने दलित वोटों को अपनी तरफ सफलता से खींचा था। साथ ही सोशल इंजीनियरिंग कर सकल हिंदुअों को एक करने का दावा करने वाली भाजपा के लिए भी यह बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंकि यूपी में यूजीसी नियमो और शंकराचार्य प्रकरण ने पहले ही अगड़ों में गहरी दरार पैदा कर दी है।
यूं भी आजकल भारत रत्न और अन्य नागरिक पुरस्कार चुनावी गणित के मद्देनजर जाति या समुदाय विशेष का वोट बैंक साधने की दृष्टि से देने का चलन है। इस हिसाब से भी मोदी सरकार कांशीराम को भारत रत्न’ देने की घोषणा कर सकती है। लेकिन उसकी मुश्किल यह है िक यदि वह चुनाव के पहले कांशीराम को भारत रत्न दे देती है तो इसका राजनीतिक श्रेय राहुल गांधी ले जाएंगे और अगर सरकार ने इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाला तो कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष भाजपा के दलित विरोधी होने का नरेटिव सेट करेगा। अभी यूपी में गैर जाटव दलितों का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ है, अगर दलित वोट चुनाव में भाजपा से विपक्ष की तरफ चले गए तो यूपी में तीसरी बार विस चुनाव भाजपा के लिए मुश्किल होगा। हालांकि राहुल की मांग को दलित कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह तो आगे पता चलेगा।
अब बात दलित मुख्येमंत्रियों की। गौरतलब है कि इस देश में आजादी के बाद से अब तक कुल आठ दलित मुख्यदमंत्री बने हैं। इनमें से चार कांग्रेस ने बनाए हैं जबकि भाजपा ने एक भी दलित सीएम नहीं बनाया है। पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते केवल एक दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया था, वो थे दामोदरम् संजीवैया। संजीवैया आंध्रप्रदेश के दूसरे सीएम थे और अपने पद पर केवल दो साल तक ही रह सके। उनके अलावा भोला पासवान शास्त्री बिहार, सुशील कुमार शिंदे महाराष्ट्र, जगन्नाथ पहाडि़या राजस्थान, चरनजीत सिंह चन्नी पंजाब के अल्पकालीन मुख्यतमंत्री रहे। सबसे ज्यादा तीन दलित मुख्यतमंत्री बिहार में हुए, ये हैं जीतनराम मांझी, भोला पासवान शास्त्री तथा राम सुंदर दास। इनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। केवल उत्तर प्रदेश में मायावती ऐसी दलित नेता हैं, जो न केवल चार बार सीएम बनी बल्कि अंतिम बार उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल भी पूरा किया।
जहां तक सवाल कांशीराम के नेहरूजी के प्रधानमंत्री रहते सीएम बनने का है तो यह खयाली पुलाव ज्यादा है। क्योंकि 1964 में जब नेहरूजी का निधन हुआ, तब कांशीराम की उम्र केवल 30 साल थी। पहले वो सरकारी नौकरी करते थे। एक्टिविस्ट तो बाद में बने। ऐसे में उन्हें किस आधार पर सीएम बनाया जाता और वो भी यूपी का, जिससे उनका तब तक कोई सम्बन्ध नहीं था, समझना कठिन है। जब यूपी में बसपा का सीएम बनने की बात आई तो कांशीराम ने अपनी शिष्या मायावती का नाम आगे किया। क्योंकि उनका मिशन सत्ता का उपभोग करना था ही नहीं। वैसे भी कांग्रेस ने यूपी में आज तक किसी दलित को सीएम नहीं बनाया। रही बात भारत रत्न की तो देश में अब तक 53 असाधारण प्रतिभाअों को यह सम्मान दिया गया है, उनमें से दलित नाम केवल बाबा साहब अंबेडकर का है। वो भी उनकी जन्म शताब्दी पर तत्कालीन जनता दल की पीवी सिंह सरकार ने दिया था। अगर नेहरूजी चाहते तो देश को संविधान देने के लिए बाबा साहब को 1954 में भारत रत्न की पहली सूची में ही शामिल कर सकते थे। तब तो बाबा साहब जीवित थे। हालांकि भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान और इससे विभूषित होने वाले महान लोगों को केवल जाति के चश्मे से देखना संकीर्णता है, लेकिन पहली सूची में जिन चार लोगों के नाम थे, उनमें तीन ब्राह्मण और एक वैश्य समुदाय से थे। कांग्रेस चाहती तो यूपीए के अपने दस साल के कार्यकाल में कांशीराम को भारत रत्न दे सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। यह अपेक्षा अब वह मोदी सरकार से कर रही है।
अजय बोकिल , संपादक











