थोक महंगाई 5 महीने में सबसे ज्यादा:खाने-पीने की चीजें महंगी होने का असर; फुटकर महंगाई में भी तेजी

थोक महंगाई 5 महीने में सबसे ज्यादा:खाने-पीने की चीजें महंगी होने का असर; फुटकर महंगाई में भी तेजी

थोक महंगाई सितंबर में बढ़कर 11.39% पहुंच गई है। सरकार ने आज, 14 अक्टूबर को ये आंकड़े जारी किए। यह पांच महीने में सबसे ज्यादा है। अगस्त में यह 9.92% थी।

थोक महंगाई की वजह खाने-पीने की चीजें, फ्यूल, पावर और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का महंगा होना है। सितंबर में रिटेल महंगाई भी बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई है। अगस्त में यह 4.82% थी।

थोक महंगाई दर 11.39% होने का मतलब यह है कि जो सामान पिछले साल इस समय थोक बाजार में ₹100 का मिल रहा था, वह आज लगभग ₹111.39 का है।

ये आंकड़े नए बेस ईयर के मुताबिक हैं। सरकार ने 15 जून 2026 को WPI का नया बेस ईयर 2022-23 लागू किया था। इसने पुरानी 2011-12 की सीरीज की जगह ली है।

थोक महंगाई दर से जुड़ी 6 बड़ी बातें…

  • कुल थोक महंगाई में बड़ी बढ़त: सितंबर महीने में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई, जो कि अगस्त में 9.92% दर्ज की गई थी।
  • खाने-पीने की चीजों में तेजी: खाद्य पदार्थों की महंगाई दर अगस्त के 7.05% के आंकड़े से उछलकर सितंबर में 8.66% दर्ज हुई।
  • ईंधन व बिजली क्षेत्र में उछाल: फ्यूल और पावर सेक्टर में महंगाई दर अगस्त के 22.93% से तेजी से बढ़कर 25.85% पर पहुंच गई।
  • कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी: प्राइमरी आर्टिकल्स (कच्चा सामान) की महंगाई दर अगस्त के 7.76% से बढ़कर सितंबर में 8.67% हो गई।
  • कारखानों के निर्मित सामान महंगे: मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट्स की महंगाई दर अगस्त के 8.37% से बढ़कर 9.76% हो गई।
  • महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख सेक्टर्स: पेट्रोल-डीजल, खाने-पीने की वस्तुएं, क्रूड ऑयल, गैस, कोयला और टेक्सटाइल में सबसे ज्यादा तेजी रही।

बेस ईयर और सबसे बड़ी बढ़त का मतलब

1. बेस ईयर क्या होता है?

जब भी सरकार महंगाई नापती है, तो वह किसी एक पुराने साल को ‘पैमाना’ मान लेती है, ताकि उससे तुलना करके पता चल सके कि आज चीजें कितनी महंगी हुई हैं।

सरकार ने 2022-23 को नया पैमाना यानी बेस ईयर बनाया है। इसका मतलब है कि आज के सामानों की कीमतों की तुलना 2022-23 के दामों से की जा रही है।

2. पांचवीं सबसे बड़ी बढ़त का क्या मतलब है?

जब से सरकार ने 2022-23 का यह नया पैमाना लागू किया है, तब से लेकर सितंबर 2026 तक महंगाई दर में यह पहला मौका है, जब थोक कीमतें इतनी तेजी से बढ़ी हैं।

आसान शब्दों में कहें तो, नए नियमों और नए पैमाने के तहत देश में यह अब तक की पांचवीं सबसे ज्यादा महंगाई दर्ज की गई है।

थोक महंगाई का आम आदमी पर असर

थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं।

सरकार केवल टैक्स के जरिए होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) को कंट्रोल कर सकती है, जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है।

रिटेल महंगाई 5.54% पर पहुंची

सितंबर में रिटेल महंगाई बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई है। अगस्त में यह 4.82% थी। आलू, प्याज, टमाटर जैसी सब्जियों और खाने-पीने की चीजों के दाम चढ़े हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से कच्चा तेल भी महंगा हुआ है। इन कारणों से महंगाई लगातार 11वें महीने बढ़ी है।

दो तरह की होती है महंगाई

भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है।

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