संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के भाषण पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने चेतावनी दी है कि 'पाकिस्तान की तरफ से फैलाए जा रहे आतंकवाद के नतीजे भुगतने होंगे'। भारत ने जम्मू-कश्मीर पर शहबाज शरीफ की टिप्पणियों को खारिज करते हुए अपनी रक्षा करने के अधिकार पर जोर दिया।
'राइट ऑफ़ रिप्लाई' यानि जवाब देने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की फर्स्ट सेक्रेटरी पेटल गहलोत ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह अपने देश में लोगों के अधिकारों का दमन करते हुए महासभा का इस्तेमाल 'पाखंडपूर्ण उपदेश' देने के लिए कर रहा है।
पाकिस्तानी पीएम के बयान पर भारत के पांच प्रहार
पीओके के रावलकोट में नरसंहार- शहबाज शरीफ ने कश्मीर पर भारत को घेरने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया को दोबारा 'उस मोड़' (मई-2025) पर पहुंचने से रोकने के लिए कश्मीर विवाद का उचित समाधान जरूरी है और साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीरी UN जनमत संग्रह का आठ दशकों से इंतजार कर रहे हैं। इसपर भारत ने आईना दिखाते हुए पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलकोट और मुजफ्फराबाद में हो रहे भीषण विरोध प्रदर्शनों, आटे-बिजली के संकट और पाकिस्तानी पुलिस के अत्याचारों का मुद्दा उठाया।इमरान खान और विपक्ष पर तानाशाही- भारत ने पाकिस्तान में मानवाधिकारों और लोकतंत्र की स्थिति पर घेरते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल, जेल के अंदर उन पर हो रहे अत्याचारों और राजनीतिक विरोधियों के दमन का हवाला देकर पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दावों को बेनकाब कर दिया। भारत की प्रतिक्रिया ने पाकिस्तान के नागरिक नेतृत्व और उसकी सेना के बीच के रिश्ते को भी निशाना बनाया।
भारतीय डिप्लोमेट गहलोत ने पाकिस्तानी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक अधिकारों की बात तो करता है लेकिन अपनी ही राजधानी को अपने ही लोगों के खिलाफ किले में बदल रही है। उन्होंने कहा 'हमने लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों के बारे में ऐसी सरकार से पाखंडपूर्ण बातें सुनीं जिसकी राजधानी इस समय अपने ही लोगों के खिलाफ किले में बदली जा रही है।'
पाकिस्तान की राजनीति पर सेना का कब्जा- भारतीय डिप्लोमेट ने दुनिया के सामने यूएन में साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार सिर्फ एक मुखौटा है जबकि देश की असली बागडोर, नीतियां और आंतरिक फैसले रावलपिंडी यानि पाक सेना मुख्यालय से तय होते हैं। उन्होंने कहा 'उनके कठपुतली नेता आते-जाते रह सकते हैं लेकिन हमें इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि असल में फैसले कौन लेता है।' गहलोत ने पाकिस्तान के सत्ता ढांचे की आलोचना करते हुए वहां के 27वें संशोधन और उसके 'असली शासक' को मिलने वाली आजीवन छूट का भी जिक्र किया।
वैश्विक आतंकवाद की नर्सरी और सुरक्षित जन्नत- भारतीय डिप्लोमेट ने UN के मंच से दुनिया को फिर से याद दिलाया कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे UN-सूचीबद्ध आतंकी संगठन और ओसामा बिन लादेन जैसे दुर्दांत आतंकवादी पाकिस्तान की ही सरपरस्ती में फले-फूले हैं।
अल्पसंख्यकों का व्यवस्थित उत्पीड़न- गहलोत ने पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों और अल्पसंख्यकों के साथ उसके बर्ताव का जिक्र करते हुए, धार्मिक असहिष्णुता को लेकर पाकिस्तान की आलोचना को चुनौती दी। उन्होंने कहा 'इस सभा में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर ऐसी सरकार ने टिप्पणी की जिसका मुख्य आधार ही ईशनिंदा कानून हैं। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। कोई भी खोखली-मीठी बातें दुनिया को गुमराह नहीं कर सकतीं।' भारत का पक्ष रखते हुए उन्होंने सदस्य देशों से कहा कि वे पाकिस्तान को UN में दिए गए बयानों के बजाय उसकी नीतियों के आधार पर परखें।
