असल ‘लीक’ तो नैतिक ईमानदारी और आॅन लाइन व्यवस्था में है...

असल ‘लीक’ तो नैतिक ईमानदारी और आॅन लाइन व्यवस्था में है...
देश भर के 407 सरकारी और निजी मेडिकल काॅलेजों की स्नातक कक्षाअों(यूजी) 1 लाख सीटों पर प्रवेश के लिए  एनटीए ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) द्वारा 3 मई को आयोजित नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट अंडरग्रेजुएट) 2026 परीक्षा के पेपर लीक होने के बाद इस में जहां लाखों परीक्षार्थियों में भारी गुस्सा है, वहीं आयोजक संस्था की साख पर फिर बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है। असली सवाल तो यही है कि इतनी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाअों की गोपनीयता आखिर कायम क्यों नही रह पाती? एनटीए अपनी स्थापना के 9 साल बाद भी इन लूप होल्स को बंद क्यों नहीं कर पाई? क्या इस धांधली के जारी रहने देने में खुद एनटीए का ही कोई स्वार्थ है अथवा इसके नियंताअों में उसे रोकने की क्षमता ही नहीं है? नीट जैसी अत्यंत  महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा के रद्द होने का मुद्दा अब प्रशासनिक के साथ-साथ राजनीतिक भी बन गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद गांधी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि नीट रद्द। 22 लाख से ज़्यादा स्टूडेंट्स की मेहनत, त्याग और सपनों को इस भ्रष्ट भाजपाई व्यवस्था ने कुचल दिया।
परीक्षाएं पहले भी इस देश में होती रही हैं, लेकिन उनकी अपनी पवित्रता, गोपनीयता और सत्यनिष्ठा होती थी। अपवाद स्वरूप ही किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र ‘लीक’ होने जैसी घटना होती थी, जबकि तब लगभग सारा मनुष्यों द्वारा ही ‍िकया जाता था। आज अधिकांश काम तकनीक आधारित है, लेकिन पवित्रता और गोपनीयता का पैमाना बहुत नीचे चला गया है। आए दिन पेपर लीक होने, पेपर सेटिंग में धांधली होने, परीक्षा अगर ठीक से हो भी गई तो रिजल्ट में भी गड़बड़ी जैसी शिकायतें आम हैं। इसके पीछे असल कारण परीक्षा के प्रति बुनियादी ईमानदारी का अभाव और पवित्रता के नैतिक आग्रह का रसातल में जाना और आॅन लाइन जैसी तकनीकी पद्धतियां भी हैं, जिनसे काम की गति और व्यापकता भले बढ़ी हो, लेकिन पारदर्शिता न्यूनतम हो गई है। कोई किसी भी साइट को हैक कर सकता है तो कोई भी पेपर किसी भी स्तर पर लीक हो सकता है। कुछ जगह तो खुद पेपर सेटर ही धंधा करते पाए गए हैं तो कई स्थानों पर प्रिंटिग प्रेस के लोग ही पैसे की खातिर अपना ईमान बेचने में संकोच नहीं कर रहे हैं। यह अत्यंत शर्मनाक और चिंतनीय स्थिति है। क्योंकि हमारी प्रवेश परीक्षाअों की इस बदहाली और गिरती साख का गलत संदेश पूरी दुनिया में जाता है। इसकी वजह से जो परीक्षार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास करते हैं, उनकी योग्यता को भी संदेह से देखा जाता है। हालांकि योग्यता और मेहनत को पलीता लगाने वाले इस अवैध कारोबार में जो लोग लगे हैं, उन्हें नैतिक मूल्यों की रत्ती भर भी चिंता नहीं है। कई जगह तो उन्हें किसी न किसी स्तर पर राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है। जिस तरह हमारे यहां ‘पेपर लीक’ एक संगठित कारोबार बन चुका है, वैसा तो छोटे-छोटे देशों में भी नहीं होता। उच्च शिक्षा की अपनी एक पवित्रता और प्रामाणिकता होती है। हमारे देश में यही नीलाम हो रही है। 
इस बीच पेपर लीक होने की घटना से परेशान एनटीए ने प्रवेश परीक्षा ही रद्दकर इसे पुन: आयोजित करने की घोषणा की है। साथ ही इस पेपर लीक कांड की जांच सीबीआई को सौंप दी है। सीबीआई ने आरंभिक जांच में कुछ लोगों को गिरफ्ताआर भी किया है। आगे और भी खुलासे होंगे। सीबीआई ने इस मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, विश्वासघात, चोरी और सबूत नष्ट करने जैसी भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और पब्लिक एग्जामिनेशन (अनफेयर मीन्स की रोकथाम)  अधिनियम-2024 के तहत भी कार्रवाई की जा रही है। भारत में पब्लिक एग्जामिनेशन ( प्रिवेंशन आॅफ अनफेयर मीन्स एक्ट 2024) के तहत किसी परीक्षा का पेपर लीक करने पर अपराधी को 3 से 5 साल तक की जेल तथा 10 लाख रू. तक जुर्माना और पेपर लीक का संगठित अपराध करने पर 5 से 10 साल की जेल तथा 1 करोड़ रू. जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन जिस तरह पेपर लीक गिरोहों के हौसले बुलंद हैं, उससे लगता है कि उन्हें कहीं ऊंचे स्तर पर भी संरक्षण प्राप्त है और कानून का कोई खौफ ही नहीं है। यानी जैसे वो पकड़े गए हैं, वैसे ही छूट भी जाएंगे। कायदे से तो पेपर लीक को एक अत्यंत गंभीर नैतिक अपराध और देशद्रोह माना जाना चाहिए। लेकिन क्या कोई भी पेपर किस स्तर पर लीक होता है और ऐसा न हो सके इसे रोकने के क्या तकनीकी, कानूनी और नैतिक उपाय हैं, इस बारे में बहुत स्पष्ट और विश्वसनीय उपाय और जानकारी नहीं है। वैसे भी भारत में साइबर सुरक्षा की हालत दयनीय ही है। 
नीट परीक्षा में बैठने वाले लाखों बच्चे ऐसे हैं, जिनके अभिभावकों ने भारी पैसा खर्च कर बच्चे को डाॅक्टर बनाने का सुनहरा सपना देखा था। लेकिन परीक्षा के दिन के कुछ समय पहले ही देश में कई जगह इसके गैस पेपर वायरल हुए, जो वास्तविक पेपर से काफी ‍िमलते-जुलते थे। ये पेपर कई परीक्षार्थियों ने लाखों रूपए देकर खरीदे थे, बिना यह सोचे कि अगर परीक्षा रद्द हो गई तो उनका यह पैसा पानी में चला जाएगा। उधर पेपर लीक को लेकर एनटीए ने अपने बयान में कहा कि जांच एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर यह तय हुआ कि मौजूदा परीक्षा प्रक्रिया को जारी नहीं रखा जा सकता। दोबारा होने वाली परीक्षा की तारीखें और नए एडमिट कार्ड का शेड्यूल आने वाले दिनों में एजेंसी के आधिकारिक माध्यमों से जारी किया जाएगा। हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दोबारा परीक्षा के पेपर में भी गोपनीयता बरकरार रह पाएगी या नहीं। दुर्भाग्य से इस  पेपर लीक मामले के तार अन्य राज्यों के गिरोहों के साथ मप्र के सीहोर से जुड़ रहे हैं, जहां पुलिस ने पेपर लीक मास्टर माइंड शुभम् खैरनार को नाशिक से गिरफ्तामर किया। शुभम वहां की सत्यसाई यूनिवर्सिटी का छात्र बताया जाता है, जो कभी काॅलेज नहीं गया। शुभम के पीछे एक बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसका खुलासा होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि एनटीए द्वारा आयोजित परीक्षा की विश्वनसनीयता और पारदर्शिता शुरू से सवालों के घेरे में रही है। एकीकृत संस्था एनटीए का गठन भारत सरकार ने देश भर में होने वाले प्रमुख काॅलेज और स्कूल प्रवेश परीक्षाअों में गड़बड़ी की अलग-अलग शिकायतों के बाद 2017 में समूची प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीयता बनाने के उद्देश्य से किया था। एनटीए आज देश में हर साल मेडिकल सहित वि‍भिन्न विषयों सम्बन्धित काॅलेजों में प्रवेश की केन्द्रीय स्तर पर 21 तथा 4 स्कूलों की प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करता है। इनमें भी सर्वाधिक‍ विवादित नीट यूजी और पीजी की प्रवेश परीक्षाएं होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आज स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाली कमाई। माना जाता है कि व्यक्ति एक बार डाॅक्टर बन जाए तो फिर सब कुछ हरा ही हरा है। यही कारण है कि लोग नीट परीक्षा का पेपर पहले हासिल करने के लिए लाखों रू. खर्च करने को तैयार हैं। बस एक बार किसी तरह एडमिशन मिल जाए। अगर इसी साल की नीट यूजी की बात की जाए तो इसमें करीब 22 लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा दी थी। यदि इनमें से 1 प्रतिशत परीक्षार्थियों को भी लीक पेपर या गैस पेपर ‍िमले या खरीदे होंगे और उन्होंने औसतन 10 लाख रू. प्रति पेपर भी खर्च किए होंगे तो यह अवैध कारोबार लगभग 220 करोड़ का होता है। जबकि एनटीए को परीक्षा शुल्क में (अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग-अलग फीस है) प्रति परीक्षार्थी औसतन 1 हजार रू. मान लें तो उसे 220 करोड़ रू. की आय हुई होगी। यानी मोटे तौर पर यह आय पेपर लीक कारोबार के बराबर ही बैठती है।  
उल्लेखनीय है कि एनटीए का काम पहले भी बहुत विश्वसनीय नहीं रहा है। 2024 में भी एजेंसी को तब भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था, जब असामान्य रूप से बहुत ज्यादा उम्मीदवारों ने रैंक 1 हासिल की थी। उस समय ग्रेस मार्क्स, बढ़े हुए स्कोर और पूरी परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए थे। तब भी पेपर लीक और संगठित नकल के आरोप सामने आने के बाद जांच शुरू की गई थी। कई लोगों को राज्य पुलिस एजेंसियों ने गिरफ्तार भी किया था। छात्र, अभिभावक और शिक्षक परीक्षा रद्द कराने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। हालांकि, कोर्ट ने सभी उम्मीदवारों के लिए दोबारा परीक्षा कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने माना था कि कुछ परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा की “पवित्रता” प्रभावित हुई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने एनटीए के कामकाज में सुधार की घोषणा की थी। लेकिन नतीजा सामने है। 
-   अजय बोकिल ,  संपादक 

Advertisement