एमपी सरकार के पास नहीं है कोई रिकॉर्ड
कटनी स्थित कैमोर की चर्चा अब वैश्विक स्तर पर हो रही है। इस बीच सबसे रहस्यमयी बात यह है कि मध्य प्रदेश सरकार के पास कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि इस शहर में रहने वाले कितने लोग एस्बेस्टल रेशों के संपर्क में आए। साथ ही कितने लोगों को एस्बेस्ट से जुड़ी बीमारी हुई है। कितने लोगों की जांच हुई और कितने लोगों की मौत इसके असर से हुई है।1933 में स्थापित हुई थी यह फैक्ट्री
कैमोर में भारत की पहली एस्बेस्टस फैक्ट्री थी, जिसे ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1933 में स्थापित किया गया था। बाद में यह प्लांट एस्बेस्टस की प्रमुख कंपनियों में से एक टर्नर एंड न्यूऑल से जुड़ गया। इसके बाद 1988 में इसे एटरनिट बिल्डिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को बेच दिया गया। 2001 में एवरेस्ट इंडस्ट्रीज ने इसे खरीद लिया। कंपनी के मालिक बदलते रहे, लेकिन एस्बेस्टस का कचरा गायब नहीं हुआ।इससे हो रहीं बीमारियों के सबूत मिले
दरअसल, ओआई की जांच में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली के बाहर के रिकॉर्ड और मेडिकल जांचों में एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारी और इसके संपर्क में आने के सबूत मिले हैं। ब्रिटिश बैरिस्टर कुष्णेंदु मुखर्जी कई सालों से कैमोर के निवासियों को मुआवजा दिलाने में मदद कर रहे हैं, जबकि चेन्नई के जनरल सर्जरी के प्रोफेसर डॉ मुरलीधर वेंकटेश्वरन ने निवासियों की जांच के लिए यहां का दौरा किया है। इस इलाके में लगभग हर कोई इससे प्रभावित है।स्थानीय प्रशासन ने दांवों की जांच नहीं की
उन्होंने कहा कि यूके के एक एस्बेस्टस ट्रस्ट ने कैमोर से आए दावों को स्वीकार किया है। कनाडा की एक पर्यावरण जांच रिपोर्ट में कैमोर और कल्हारा के कुछ हिस्सों में एस्बेस्टस प्रदूष की पुष्टि की गई है। फिर भी राज्य सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन के पास स्वास्थ्य संबंधी कोई ऐसा इकट्ठा रिकॉर्ड नहीं है, जिसके आधार पर इन दावों की जांच की जा सके।मुआवजे भी मिले
वहीं, यूके के फेडरल-मोगुल ग्रुप के एडमिनिस्ट्रेशन से बाहर निकलने के बाद 2006 में बने टी एंड एन यूके एस्बेस्ट ट्रस्ट ने बताया कि उसने भारतीय नागरियों के 3849 दावों का निपटारा किया है। जिनकी कुल राशि 141 करोड़ रुपए थी। यह आंकड़ा ट्रस्ट द्वारा संभाले गए भारतीय दावों को दिखाता है और यह सिर्फ कैमोर के लिए नहीं है।ट्रस्ट प्लांट के पूर्व कर्मचारियों, उनके परिवारों और पर्यावरण के कारण इसके संपर्क में आए लोगों के दावे स्वीकार करता है। लेकिन ट्रस्ट के पास कैमोर प्लांट का कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं है।
1988 में बेच दी कंपनी
ओकीफ ने यह भी कहा कि हमारे पास कैमोर में प्लांट से जुड़ा कोई रिकॉर्ड नहीं है। ट्रस्ट ने बताया कि फैक्ट्री एक जनवरी 1988 को एटरनिट बिल्डिंग प्रोडक्ट्स लिमिटेड को बेच दी गई थी। माना जाता है कि बिक्रि के हिस्से के तौर पर कंपनी के रिकॉर्ड भी उन्हें सौंप दिए गए थे।ब्रिटिश कंपनी ने अपने काम के दौरान कर्मचारियों को काफी ज्यादा धूल के संपर्क में रखा।
2000 से ज्यादा लोग हैं पीड़ित
इसके साथ ही कृष्णेंदु मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने 2012 में मेडिकल कैंप आयोजित करना और निवासियों को दावे दायर करने में मदद करना शुरू किया था। दावों और मेडिकल प्रक्रिया के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 1200 लोगों को मुआवजा मिला है। बीमारी के लगभग 300 नए दावों पर कामों चल रहा है और 2000 से ज्यादा लोगों ने एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों की पहचान हुई है। ये आंकड़े सरकार द्वारा प्रमाणित महामारी संबंधी गिनती नहीं हैं।इलाज सुविधाओं की जरूरत
वहीं, चेन्नई में जनरल सर्जरी के प्रोफेसर डॉ मुरलीधर वेंकटेश्वरन यहां निवासियों की जांच और उनके दावों पर काम करने में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि शहर में सही स्क्रीनिंग और इलाज की सुविधाओं की जरूरत है।सरकार को कैमोर में एस्बेस्टोसिस और फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की पहचान और इलाज के लिए बेहतर मेडिकल सेंटर बनाना चाहिए क्योंकि लगभग हर कोई इससे प्रभावित है।
