मध्य प्रदेश में बिना रेरा पंजीयन बिक रहीं प्रॉपर्टी, सरकार के नियमों को ठेंगा दिखा रहे बिल्डर

मध्य प्रदेश में बिना रेरा पंजीयन बिक रहीं प्रॉपर्टी, सरकार के नियमों को ठेंगा दिखा रहे बिल्डर

भोपाल। अवैध कॉलोनियों के निर्माण पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश ने एक फैसला किया। अब से बिल्डर को प्रापर्टी बेचने से पहले बताया होगा कि उसके पास भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (रेरा) का पंजीयन है या नहीं। विक्रय अनुबंध में रेरा पंजीयन दर्ज करना अनिवार्य किया गया है। जिस प्रापर्टी के विक्रय अनुबंध में रेरा पंजीयन नहीं है तो उप रजिस्ट्रार चाहे तो उस प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री करने से मना कर सकेगा। लेकिन न तो उप रजिस्ट्रार इसमें रुचि दिखा रहे हैं और न ही कई बिल्डर रेरा पंजीयन बताते हैं।

परिणामस्वरूप अवैध कॉलोनियां लगातार बनती जा रही हैं। इसके पीछे सरकार की मंशा है कि बिना रेरा पंजीयन के भवन विकास या प्रापर्टी विकसित न हो। यह व्यवस्था इसलिए भी की गई है, जिससे बिल्डर उपभोक्ता को धोखे में रखकर प्रापर्टी न बेच सके, लेकिन बिल्डर व कॉलोनाइजर नियमों को ताक पर रखकर सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे हैं।

दरअसल, मध्य प्रदेश में बहुत से बिल्डर रेरा में बिना पंजीयन कराए मनमाने ढंग से कॉलोनियां काटकर उपभोक्ताओं को धोखे में रखकर मकान बनाकर बेच देते हैं। उसके बाद में उपभोक्ता कई समस्याओं से जूझता है। उनकी शिकायत पर रेरा द्वारा रियल एस्टेट कारोबारियों पर शिकंजा कसते हुए जुर्माना लगाने का भी प्रविधान है, लेकिन रेरा को ठेंगा दिखाया जा रहा है।

इधर, मध्य प्रदेश रेरा में अध्यक्ष का पद खाली रहने के कारण प्रोजेक्ट्स की मंजूरी और शिकायतों के निराकरण लंबे समय से प्रभावित हुए हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इसे लेकर सरकार को कड़ी चेतावनी दी थी कि जल्द नियुक्तियां करें, अन्यथा मुख्य सचिव को पेश होना पड़ेगा।

रेरा में कम हो रहे पंजीयन

  • उपभोक्ता के सामने अब भी विश्वास का संकट पांच वर्षों में वर्ष 2021-22 से अब तक 6323 आवेदन निराकरण के लिए रेरा के पास पहुंचे। इनमें से पंजीयन के लिए करीब आधे 3398 ही स्वीकृत हुए हैं। 981 को निरस्त कर 171 को वापस किया गया है।
  • हर वर्ष 50 से 82 प्रतिशत तक आवेदन निराकृत हो रहे हैं, लेकिन इनमें देखने वाली बात यह है कि कम पंजीयन संख्या से स्पष्ट है कि बिल्डर और प्रमोटर अब भी मनमाने ढंग से ही भवनों का निर्माण कर रहे हैं। यानी उपभोक्ता के सामने अब भी विश्वास का संकट है। जबलपुर समेत इंदौर और ग्वालियर में रेरा का ब्रांच दफ्तर खोले जाने की मांग भी लंबे समय से की जा रही है, लेकिन इस दिशा में भी अब तक कोई निर्णय नहीं हो सका है।
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