'पद्मा की रानी' का अकाल या मजबूरी? दुनिया को हिलसा खिलाने वाला बांग्लादेश क्यों खरीद रहा भारत से 'गुजराती इलिश'?

'पद्मा की रानी' का अकाल या मजबूरी? दुनिया को हिलसा खिलाने वाला बांग्लादेश क्यों खरीद रहा भारत से 'गुजराती इलिश'?
ढाका: बंगाली समाज में कहावत है 'इलिश छाड़ा पूजा अधूरा' यानि हिलसा के बिना दुर्गा पूजा अधूरी है। लेकिन पिछले कुछ समय से दक्षिण एशियाई समुद्री व्यापार के गलियारों में एक ऐसा अजीबोगरीब 'फिश कूटनीति' और अर्थशास्त्र का चक्र देखने को मिल रहा है जिसने पाक-कला के शौकीनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार विश्लेषकों को हैरान कर दिया है।

जिस बांग्लादेश के पास दुनिया की 70% से ज्यादा हिलसा पकड़ने का एकाधिकार है और जिसकी 'पद्मार इलिश' यानि पद्मा नदी से निकलने वाली स्वादिष्ट हिसला मछली को स्वाद का गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है वही बांग्लादेश आज भारत के गुजरात (भरूच और नर्मदा बेसिन) से सैकड़ों टन हिलसा आयात कर रहा है।
दूसरी तरफ कोलकाता और हावड़ा के बाजार में रहने वाले बंगाली मानस 'पद्मा की हिलसा' के लिए 2,500 से 3,000 रुपये प्रति किलो तक चुकाने को तैयार हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों पैदा हुआ? कैसे दुनिया का सबसे बड़ा हिलसा निर्यातक देश खुद भारत से मछली मंगवाने पर मजबूर हो गया? आइए जानते हैं।


हिलसा मछली- पद्मा, गंगा और गुजरात

दरअसल बांग्लादेश की 'पद्मा इलिश' यानि पद्मा नदी की हिलसा मछली सभी हिलसा मछलियों में सबसे खास मानी जाती है। लेकिन इसे पाना लगभग नामुमकिन है। जब भी ये कोलकाता के बाजारों में पहुंचती है तो यह अपने आप में एक बड़ी घटना होती है। इसे बहुत सावधानी से रखा जाता है। बांग्लादेशी इसे काफी सम्मान देते हैं और प्लास्टिक बैक से लपेटकर बाकी मछलियों से अलग रखते हैं। बंगाली रसोई में हिलसा केवल एक मछली नहीं बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता, पर्व-त्योहारों की शुभता और फुटबॉल प्रतिद्वंद्विता जैसे ईस्ट बंगाल एफसी का अनऑफिशियल मैस्कॉट का प्रतीक है। लेकिन हर हिलसा का स्वाद एक जैसा नहीं होता। बाजार में मिलने वाली हिलसा मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित है-
पद्मार इलिश (बांग्लादेश)- यह स्वाद और खुशबू के मामले में सबसे ऊपर बैठती है। मीठे पानी में अंडे देने के लिए बहने वाली पद्मा और मेघना नदी की इस मछली में वसा की मात्रा सबसे ज्यादा होती है। इसका तेल पकाने पर एक खास मिठास छोड़ता है। ये मछली खारे पानी के समुद्र में रहती है लेकिन अंडे देने के लिए मीठे पानी में आती है। इसलिए इस मछली का सुगंध खाने वालों के उंगलियों पर काफी देर तक बना रहता है।

गंगा/डायमंड हार्बर इलिश (पश्चिम बंगाल)- स्वाद के मामले में यह पद्मा के काफी करीब है लेकिन इसकी सुगंध थोड़ी कम तीखी होती है। यह भारत में 1,500 से 1,800 रुपये प्रति किलो बिकती है।
गुजराती या भरूच इलिश- गुजरात के भरूच और नर्मदा नदी के मुहाने से पकड़ी जाने वाली यह मछली समुद्री और दुबली होती है। इसमें अंडे की मात्रा ज्यादा होती है जिससे इसका मांस थोड़ा कड़वा और कम वसायुक्त लगता है।

पद्मा की हिलसा मछली की सप्लाई क्यों ठप हुई?

दशकों से बांग्लादेश भारत को दुर्गा पूजा के दौरान तोहफे के तौर पर हजारों टन हिलसा भेजता रहा है। हालांकि साल 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था और बाद में दुर्गा पूजा के दौरान सीमित मात्रा में में हिलसा मछली की सप्लाई की जाने लगी।
लेकिन शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद साल 2025 में ढाका की मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने भारत के लिए सिर्फ 1,200 टन हिलसा के निर्यात की इजाजत दी। जो 2024 के 2,400 टन से आधी थी। इसमें से भी जमीनी और सीमा शुल्क की रुकावटों के चलते भारत में सिर्फ 150 टन ही हिलसा पहुंच पाई। इस साल यानि 2026 में कोई भी आधिकारिक शिपमेंट मंजूर नहीं की गई जिसके कारण कोलकाता के बाजारों में फ्रोजन 'पद्मा हिलसा' की कीमत 3,000 रुपये प्रति किलो के पार चली गई है।
पश्चिम बंगाल में स्थानीय गंगा हिलसा का उत्पादन भी पर्यावरण क्षरण और अत्यधिक मछली पकड़े जाने के कारण 2001 में 80,000 टन से घटकर अब लगभग 10,000 टन पर आ गया है।

बांग्लादेश क्यों खरीद रहा है गुजराती हिलसा?

जहां कोलकाता के लोग पद्मा की हिलसा के लिए जेब खाली कर रहे हैं वहीं पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश ने पश्चिम बंगाल के पेट्रापोल लैंड पोर्ट के रास्ते भारत से 500 टन से ज्यादा गुजराती हिलसा का आयात किया है। इसके पीछे तीन वजहें बताई गई हैं।
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