हाफिज सईद, मसूद अजहर, पाकिस्तान से बेवकूफ बनता FATF, अब ब्लैकलिस्ट नहीं किया तो खत्म हो जाएगी साख!

हाफिज सईद, मसूद अजहर, पाकिस्तान से बेवकूफ बनता FATF, अब ब्लैकलिस्ट नहीं किया तो खत्म हो जाएगी साख!
इस्लामाबाद: पाकिस्तान ने इस हफ्ते मोस्ट वांटेड आतंकवादी मसूद अजहर पर रखे गये 50 लाख के इनाम को बढ़ाकर 70 लाख कर दिया है। मसूद अजहर वही आतंकवादी है जिसके परिवार के 10 सदस्य पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के हमले में मारे गये थे। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की बैठकों से पहले पाकिस्तान हर बार ऐसी ही नौटंकी करता आया है और आतंकवाद विरोधी इस संस्था को बेवकूफ बनाता आया है।

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बात करते हुए जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने कहा कि 'पाकिस्तान इस खेल में माहिर है और डोनाल्ड ट्रंप का अभी उसे साथ मिला हुआ है। इसलिए बहुत कम उम्मीद है कि उसे ग्रे लिस्ट में डाला जाएगा।' एसपी वैद वो पुलिस अधिकारी रहे हैं जिन्होंने कई बार मसूद अजहर से पूछताछ की जब वो भारतीय जेल में बंद था। जब मसूद अजहर को कांधार विमान अपहरण के बाद छोड़ा गया था उस वक्त एसपी वैद ही उसे लेकर जेल से गये थे।

कैसे FATF की पाबंदियों से बचने के लिए पैंतरे बदल रहा पाकिस्तान

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) को लेकर पाकिस्तान हर बार ऐसी ही पैंतरेबाजी करता है। पेरिस में 26 अक्टूबर को होने वाली बैठक से ठीक एक महीने पहले इस्लामाबाद ने जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पर इनाम की राशि बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दी और फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की 'रेड बुक' में उसका नाम फिर से 'भगोड़े' के तौर पर दर्ज किया।

भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तान के इस कदम को दिखावा करार दिया है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बात करते हुए एसपी वैद ने इसे ध्यान भटकाने की चाल बताया। उनका कहना बिल्कुल सही भी है क्योंकि इस कदम के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत संपत्ति जब्त करने की कोई पुष्टि नहीं हुई, प्रत्यर्पण में कोई सहयोग नहीं मिला और न ही जैश-ए-मोहम्मद के संगठनात्मक ढांचे को खत्म करने की कोई कार्रवाई हुई। पाकिस्तान ने जो पेश किया है वह बस उसके तमाशे को दिखाता है।

क्या अंधी हो चुकी है आतंकवाद पर नजर रखने वाली संस्था?

सीनियर आईपीएस अधिकारी ब्रिजेश सिंह ने द संडे गार्डियन में लिखा है कि पाकिस्तान की यह कोई नई चाल नहीं है। पाकिस्तान को 2018 में 27-पॉइंट वाले एक्शन प्लान के तहत FATF की ग्रे लिस्ट में धकेला गया था और अक्टूबर 2022 में प्रोबेशन पर उससे बाहर निकाला गया। इस बीच के समय में एक तय पैटर्न दिखा। हर प्लेनरी मीटिंग से कुछ हफ्ते पहले गिरफ्तारियां, नजरबंदी के आदेश और बैन लगाने के नोटिस जारी होते थे और रिव्यू टीम के जाते ही यह पाकिस्तान फिर अपने कदम वापस ले लेता है।
हाफिज सईद पर FATF में दिखावा- हाफिज सईद को जेल में रखना या ढील देना किसी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था बल्कि FATF की बैठकों के कैलेंडर के हिसाब से तय होता था ताकि पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट होने से बचाया जा सके। 2022 में FATF की 'ग्रे लिस्ट' से बाहर आने के बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद रोकने के अपने कई वादे भुला दिए हैं।

सोशल मीडिया पर सरकार का सख्त कंट्रोल- पाकिस्तान अब सूचनाओं को दबाने में बहुत चालाक हो गया है। 2025 के नए PECA कानूनों के तहत बनी 'सोशल मीडिया अथॉरिटी' (SMPRA) किसी भी शिकायत पर 24 से 48 घंटे के भीतर कोई भी कंटेंट ब्लॉक कर सकती है। सरकार उन पोस्ट्स को इसलिए डिलीट नहीं कर रही क्योंकि वे झूठे हैं, बल्कि इसलिए कर रही है क्योंकि वे सरकार के खिलाफ हैं और लोगों के बीच वायरल हो रहे हैं।
चीनी तकनीक से जासूसी- एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान ने एक बहुत बड़ा और खतरनाक 'फायरवॉल' तैयार कर लिया है। 2018 में कनाडाई तकनीक और 2023 में चीनी तकनीक की मदद से एक ऐसा सर्विलांस सिस्टम बनाया गया है जिससे मोबाइल यूजर्स की बड़े पैमाने पर निगरानी की जा रही है।


FATF की विश्वसनीयता होने लगी है कम

ब्रिजेश सिंह ने लिखा है कि FATF की टीमें जो 'ऑनसाइट विजिट' यानि जमीनी मुआयना करती हैं वे बहुत कम समय के लिए और पहले से तय होती हैं। वे पाकिस्तान जैसे देश के डीप-स्टेट और उसकी चालाकी को पकड़ने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। पिछले 30 सालों में दुनिया के कई बड़े आतंकी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़े मिले हैं। अगर पाकिस्तान सिर्फ दिखावे के लिए नियमों का पालन करके FATF की कार्रवाई से बच जाता है तो FATF का डर पूरी दुनिया के लिए खत्म हो जाएगा और अन्य देश भी यही तरीका अपनाएंगे।
FATF ने कई बार पाकिस्तान के नए कानूनों, प्रतिबंधों और वॉचलिस्ट को मानकर उसे ब्लैकलिस्ट होने से बचाया है, लेकिन हर बार जमीनी स्तर पर आतंकी नेटवर्क चलते रहते हैं। अगर अक्टूबर में पेरिस में होने वाली FATF की बैठक में सिर्फ किसी आतंकी पर ईनाम घोषित करने या नया कानून बनाने को ही 'ठोस कदम' मान लिया जाता है तो यह साबित हो जाएगा कि बिना असल बदलाव किए भी FATF को बेवकूफ बनाया जा सकता है।
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