जिस अमेरिका में 9/11 हुआ, वहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ा; भारत में क्यों घटती गई राजनीतिक हिस्सेदारी?

जिस अमेरिका में 9/11 हुआ, वहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ा; भारत में क्यों घटती गई राजनीतिक हिस्सेदारी?
नई दिल्ली: 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में अल-कायदा के हमले ने करीब 3,000 लोगों की जान ले ली थी। उस भयावह हमले के बाद शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 25 साल बाद इसी अमेरिका में मुस्लिम समुदाय लोकतांत्रिक राजनीति में इतनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराएगा। इस्लामोफोबिया आज भी खत्म नहीं हुआ है और कुछ पैमानों पर इसमें बढ़ोतरी भी हुई है, लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ी है। इसके उलट भारत में लोकतंत्र कायम रहने के बावजूद मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गिरावट आई है। यही विरोधाभास अमेरिका और भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को एक साथ देखने का आधार बनता है।

9/11 के बाद मुसलमानों ने लोकतंत्र से दूरी नहीं बनाई

11 सितंबर 2001 के हमले के बाद अमेरिका में मस्जिदों को धमकियां मिलीं, मुसलमानों पर हमले हुए और नफरत से जुड़े अपराध बढ़े। उस समय अमेरिकी कांग्रेस में एक भी मुस्लिम सदस्य नहीं था। इसके बावजूद अमेरिकी मुसलमानों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था से दूरी बनाने के बजाय उसमें अपनी भागीदारी बढ़ाई। कीथ एलिसन कांग्रेस के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बने। उनके बाद कई और मुस्लिम नेता चुनाव जीतकर आगे आए और आज अमेरिकी कांग्रेस में चार मुस्लिम सदस्य हैं।

26 राज्यों में 255 मुस्लिम निर्वाचित प्रतिनिधि

‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ के अनुसार, अमेरिका के 26 राज्यों में रिकॉर्ड 255 मुस्लिम निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। इनमें 46 राज्य विधायक, 11 मेयर, 18 निर्वाचित जज, 98 काउंसिल सदस्य और 63 शिक्षा अधिकारी शामिल हैं। खास बात यह है कि इन निर्वाचित प्रतिनिधियों में 43 फीसदी महिलाएं हैं। यह उस अमेरिका की तस्वीर है जिसने 9/11 के बाद मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत और संदेह का दौर देखा था।

न्यूयॉर्क ने चुना मुस्लिम मेयर, कुरान पर ली शपथ

इस बदलाव का एक उल्लेखनीय उदाहरण न्यूयॉर्क में देखने को मिला। 9/11 के हमले का निशाना बने न्यूयॉर्क ने जोहरान ममदानी नाम के एक मुस्लिम को मेयर चुना। ममदानी ने फिलिस्तीनियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और कुरान पर हाथ रखकर पद की शपथ ली। 9/11 के बाद के माहौल को देखते हुए यह घटनाक्रम उस लोकतांत्रिक बदलाव की तस्वीर पेश करता है जिसकी शायद उस समय कल्पना करना भी मुश्किल था।

अब भारत की कहानी पर नजर डालिए

25 साल पहले भारत भी सांप्रदायिक नफरत से पूरी तरह मुक्त नहीं था। 2002 की गुजरात हिंसा इसकी एक क्रूर याद है। इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र में ऐसे उदाहरण सामने आए, जिन्हें दुनिया के सामने लोकतांत्रिक भागीदारी के उदाहरण के तौर पर देखा गया। 2006 में अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने भी भारत की राजनीतिक स्थिति पर हैरानी जताई थी। उन्होंने कहा था कि भारत में धार्मिक बहुसंख्यक हिंदू हैं, सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व एक ईसाई कर रहा है, राष्ट्रपति मुसलमान हैं और प्रधानमंत्री सिख हैं। उनका इशारा सोनिया गांधी, अब्दुल कलाम और मनमोहन सिंह की ओर था।

मुस्लिम समुदाय की राष्ट्रीय पहचान से जुड़ाव

भारतीय मुसलमानों के लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय जुड़ाव की तस्वीर 2005 के CSDS सर्वे में भी दिखाई दी। सर्वे में लोगों से भारतीय और राज्य या क्षेत्रीय पहचान में से किसी एक को चुनने के लिए कहा गया था। इसमें 43 फीसदी मुसलमानों ने खुद को ‘सिर्फ भारतीय’ बताया, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 34 फीसदी था। बाकी लोगों ने अपनी क्षेत्रीय और धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान जितना या उससे अधिक मजबूत माना। यह आंकड़ा उन लोगों के दावों के विपरीत तस्वीर पेश करता है जो भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल उठाते रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, हिंदू बहुसंख्यकों की तुलना में मुसलमानों ने भारत के साथ अपना जुड़ाव अधिक मजबूती से महसूस किया।

भारत में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गिरावट

अब मौजूदा तस्वीर पर नजर डालें तो भारत में लोकतंत्र खत्म नहीं हुआ है। भारतीय मतदाता अब भी सरकारों को सत्ता से बाहर करते हैं। लेकिन इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हुआ है और सोशल मीडिया पर इस्लाम विरोधी नफरत भी दिखाई देती है। 2011 में भारत की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 14.2 फीसदी थी, लेकिन 2024 में लोकसभा सांसदों में उनकी हिस्सेदारी केवल 4.4 फीसदी रही। इनमें से कोई भी सांसद सत्ताधारी NDA का सदस्य नहीं था।

राज्यों में भी घटती गई मुस्लिम विधायकों की संख्या

राज्यों के स्तर पर भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व में कमी दर्ज की गई। मुस्लिम विधायकों की संख्या 2013 में 339 थी, जो अब घटकर 255 रह गई है। उत्तर प्रदेश में यह संख्या 63 से घटकर 31, पश्चिम बंगाल में 59 से 37 और बिहार में 19 से 11 रह गई। इस तस्वीर को चार आंकड़ों में समझा जा सकता है-मुसलमान भारत की आबादी का लगभग 14 फीसदी हैं, विधायकों में उनकी हिस्सेदारी 6 फीसदी, लोकसभा सांसदों में 4.4 फीसदी और केंद्रीय मंत्रियों में शून्य फीसदी है।

‘बुलडोजर जस्टिस’ पर उठे सवाल

राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के साथ सार्वजनिक बातचीत और राजनीतिक भाषा को लेकर भी सवाल उठे हैं। ‘बुलडोजर जस्टिस’ भारत की राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन गया है। मानवाधिकार समूहों ने कहा है कि जब राज्य सरकारें अपराध या सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने के आरोपी लोगों के घर और कारोबार गिराती हैं, तो इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित मुसलमान होते हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि न्याय प्रणाली की किसी भी सभ्य व्यवस्था में बुलडोजर से न्याय करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद ऐसी कार्रवाई जारी रहने की बात कही गई है।

हेट स्पीच के आंकड़ों में भी बढ़ोतरी

अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों को लेकर ‘इंडिया हेट लैब’ नाम के रिसर्च संगठन ने 2023 में 668 घटनाएं दर्ज कीं। 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,165 और 2025 में 1,318 हो गई। यानी दो साल में दर्ज घटनाओं की संख्या लगभग दोगुनी हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दर्ज 1,318 घटनाओं में से 1,164 NDA शासित राज्यों या क्षेत्रों में हुईं। BJP अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव के आरोपों से इनकार करती है और उसका कहना है कि उसके कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ धर्म की परवाह किए बिना सभी भारतीयों को मिलता है।

सुरक्षा को लेकर मुस्लिम समुदाय की चिंता

इसके बावजूद मुस्लिम समुदाय के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता दिखाई देती है। 2005 में CSDS सर्वे में भारतीय मुसलमानों ने देश के साथ अपने मजबूत जुड़ाव की बात कही थी। वहीं 2024 में CSDS-लोकनीति के सर्वे में 54 फीसदी मुस्लिम लोगों ने कहा कि वे दूसरे भारतीयों जितना सुरक्षित महसूस नहीं करते। इनमें 11 फीसदी ऐसे थे जिन्होंने कहा कि वे बिल्कुल भी सुरक्षित महसूस नहीं करते।

लोकतंत्र सिर्फ बहुमत नहीं, अल्पसंख्यकों की भागीदारी भी

लोकतंत्र में बहुसंख्यकों के अधिकारों के साथ अल्पसंख्यकों के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी वजह से अमेरिका और भारत की तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने एक पीढ़ी पहले ऐसी तस्वीर देखी थी, जिसमें मुसलमान राष्ट्रपति भवन की ओर देखते तो उन्हें अब्दुल कलाम दिखाई देते थे। केंद्रीय कैबिनेट में मुस्लिम मंत्री थे और राजनीतिक सत्ता में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी संभव दिखाई देती थी। यह वह भारत था जिसे दुनिया के लिए लोकतांत्रिक मिसाल के तौर पर देखा जा सकता था।

अमेरिका में नफरत कायम, फिर भी राजनीतिक भागीदारी बढ़ी

इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका ने इस्लामोफोबिया पर काबू पा लिया है। ऐसा नहीं है। प्यू रिसर्च के इस साल के अध्ययन में पाया गया कि हमले के बाद के दौर की तुलना में इस्लाम के प्रति लोगों का नजरिया अधिक नकारात्मक और पक्षपाती हुआ है। फिर भी अमेरिका यह दिखाता है कि पूर्वाग्रहों के बावजूद लोकतांत्रिक राजनीतिक भागीदारी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, भारत यह सवाल खड़ा करता है कि चुनाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रहते हुए भी किसी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी कैसे कम हो सकती है। 9/11 के 25 साल बाद अमेरिका और भारत की तस्वीरें एक दिलचस्प विरोधाभास पेश करती हैं-शिष्य और गुरु ने अपनी जगहें बदल ली हैं।
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