राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के लिए 18 सितंबर की रात तक कांग्रेस की तैयारियां पूरी थीं। पार्टी नेता और कार्यकर्ता पूरे उत्साह में थे, लेकिन 19 सितंबर की सुबह होते ही एक के बाद एक नई चुनौती सामने आती गई।
पहले शहर में राहुल गांधी के विरोध में ‘झूठ की गूंज’ के पोस्टर-होर्डिंग नजर आए, फिर स्वागत के रूट में बदलाव करना पड़ा और कार्यक्रम स्थल पर भीड़ को लेकर प्रशासन की तय क्षमता और कांग्रेस के दावों के बीच बड़ा अंतर सामने था। कार्यक्रम से जुड़ी अनुमति में भी कई शर्तें थीं।
कांग्रेस पहले से ही अनुमति को लेकर प्रशासनिक स्तर पर आ रही दिक्कतों को राजनीतिक मुद्दा बनाती रही थी। पार्टी नेताओं का आरोप था कि कार्यक्रम में अड़चनें पैदा की जा रही हैं, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी अलग दलील रखी।
इन तमाम घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस ने कार्यक्रम को रद्द या सीमित करने के बजाय मौके के हिसाब से रणनीति बदली। नतीजा यह रहा कि राहुल गांधी देर से पहुंचे, इसके बावजूद छात्र संवाद पूरा हुआ और कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में युवा मौजूद रहे।
राजनीतिक तौर पर कांग्रेस के लिए क्या रहा संदेश?
पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल राहुल गांधी का कार्यक्रम कराने की नहीं थी, बल्कि अनुमति, विरोध, रूट, भीड़ और हर स्तर पर बदलती परिस्थितियों के बीच आयोजन को बनाए रखने की थी। पार्टी ने हर चरण में रणनीति बदली और कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
कांग्रेस के लिए यह आयोजन इसलिए भी अहम था क्योंकि ‘छात्रों की गूंज’ को पार्टी ने युवाओं और छात्रों से सीधे संवाद के राजनीतिक मंच के रूप में तैयार किया था। वहीं कार्यक्रम से पहले ‘झूठ की गूंज’ पोस्टर अभियान ने आयोजन को सीधे राजनीतिक टकराव का रूप दे दिया था।
यानी 18 सितंबर की रात तक जिस कार्यक्रम की तैयारी लगभग पूरी मानी जा रही थी, 19 सितंबर की सुबह से उसे एक के बाद एक चुनौतियों से गुजरना पड़ा। कांग्रेस ने हर चुनौती के साथ अपनी रणनीति बदली और अंततः राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम पूरा कराया।
