सर्वे के मुताबिक 21 अर्थशास्त्रियों और बैंक अधिकारियों में से 20 को उम्मीद है कि RBI इस बार दरों में बढ़ोतरी करेगा। एक ने उम्मीद जताई कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा। पिछले साल दिसंबर में आरबीआई ने रेपो रेट को 25 बीपीएस घटाकर 5.25% कर दिया था। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतें लगातार $100 प्रति बैरल से ऊपर रहने के कारण महंगाई की चिंताएं बढ़ गई हैं।
अमेरिका-जापान में बढ़ोतरी
अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने हाल में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी और आगे भी इसे जारी रखने का संकेत दिया था। गोल्डमैन सैश ने एक रिपोर्ट में कहा, "अगस्त में दरों को स्थिर रखने के फैसले के बाद हमने बढ़ोतरी को दिसंबर 2026 और फरवरी 2027 तक टाल दिया था। तब से हुए घटनाक्रम संकेत देते हैं कि यह प्रक्रिया जल्दी शुरू हो सकती है और टाइटनिंग का दौर लंबा चल सकता है।"रेपो रेट आखिरी बार फरवरी 2023 में 25 बीपीएस बढ़ाकर 6.50% किया गया था। भू-राजनीतिक तनाव के कारण सप्लाई चेन में रुकावट और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई के दबाव की मुख्य वजह से अमेरिका और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को भी दरें बढ़ानी पड़ी हैं। अर्थशास्त्रियों को आशंका है कि तीसरी तिमाही में महंगाई के RBI की 6% की टॉलरेंस लिमिट से ऊपर जा सकती है। साथ ही मौसम भी एक और कारण है।
महंगाई का अनुमान
केनरा बैंक के चीफ इकनॉमिस्ट माधवन कुट्टी जी ने ET को बताया, "मुझे उम्मीद है कि Q2 और Q3 के महंगाई के आंकड़े RBI के मौजूदा अनुमानों से ज्यादा होंगे क्योंकि मॉनसून खराब रहा है और कच्चे तेल की कीमतें RBI के अनुमान से ज्यादा रही हैं। अगर जियोपॉलिटिक्स और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहीं, तो Q3 में महंगाई 6.2% से 6.3% के पीक पर पहुंच जाएगी।"बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने पॉलिसी रेट पर अलग राय रखी। उन्होंने कहा, "मौजूदा मैक्रो-इकनॉमिक स्थिति वैसी ही है और जोखिम भी वैसे ही हैं जैसे अगस्त में बताए गए थे। तो RBI इस बार अलग तरह से क्यों काम करेगा? इसके अलावा, अभी ब्याज दरें बढ़ाने से त्योहारों के समय होने वाले खर्च पर असर पड़ सकता है, जबकि डिपॉजिट के मामले में इसका असर धीरे-धीरे दिखेगा।"
