इसीलिए सवाल ये है कि डोनाल्ड ट्रंप के पिछले डेढ़ वर्षों के दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन को लेकर उनकी नीति और अब बीजिंग दौरा क्या इस बात की पुष्टि है कि G2 (ग्रुप ऑफ टू) का निर्माण हो चुका है। क्या इसका मतलब है कि दुनिया की दूसरी ताकतें जैसे भारत, रूस, फ्रांस या फिर यूरोपीय संघ के लिए वैश्विक शक्ति के रेस में कोई जगह नहीं है? क्या दुनिया के दूसरे देशों को या तो चीन या अमेरिका के बीच किसी एक के छाते के नीचे रहने आना होगा और क्या भारत या रूस जैसे देश इसे बर्दाश्त करेंगे? खासकर रूस जो एक वक्त अमेरिका के सामने दूसरी शक्ति बनकर खड़ा था।
दुनिया को अमेरिका और चीन ने 2 हिस्सों में बांटा, भारत के लिए जगह नहीं? ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात
बीजिंग: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण और ईरान युद्ध, चीन ने इन दोनों ही मामलों में गहरी चुप्पी रखने का रास्ता चुना। डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी जारी है और चीन उनपर खामोश रहा है। आज अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन की राजधानी बीजिंग जाने वाले हैं जहां वो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। उनका दौरा दो दिनों के लिए है। हालांकि ये बैठक मार्च में ही होने वाली थी लेकिन ईरान युद्ध की वजह से इसमें देरी आई है। एनबीटी ऑनलाइन से बात करते हुए भारत कि रिटायर्ड सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी ने पिछले दिनों कहा था कि अमेरिका, चीन के बीच एक मौन सहमति है दुनिया को दो हिस्सों में बांटने की। ना अमेरिका चीन के मामलों में टांग अड़ाएगा और ना चीन अमेरिका के मामले में।
इसीलिए सवाल ये है कि डोनाल्ड ट्रंप के पिछले डेढ़ वर्षों के दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन को लेकर उनकी नीति और अब बीजिंग दौरा क्या इस बात की पुष्टि है कि G2 (ग्रुप ऑफ टू) का निर्माण हो चुका है। क्या इसका मतलब है कि दुनिया की दूसरी ताकतें जैसे भारत, रूस, फ्रांस या फिर यूरोपीय संघ के लिए वैश्विक शक्ति के रेस में कोई जगह नहीं है? क्या दुनिया के दूसरे देशों को या तो चीन या अमेरिका के बीच किसी एक के छाते के नीचे रहने आना होगा और क्या भारत या रूस जैसे देश इसे बर्दाश्त करेंगे? खासकर रूस जो एक वक्त अमेरिका के सामने दूसरी शक्ति बनकर खड़ा था।
अमेरिका और चीन के बीच G2 बनने की कितनी संभावना है?
G2 का विचार इस डर को जन्म देता है कि हम एक बहुपक्षीय व्यवस्था से हटकर ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें दो महाशक्तियां दूसरे देशों के हितों की परवाह किए बिना अपने हितों को ही सबसे ऊपर रखेंगी। UK के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में 'सेंटर फॉर राइजिंग पावर्स एंड ग्लोबल डेवलपमेंट' की डायरेक्टर जिंग गु ने कहा कि इस मुलाकात को G2 की शुरुआत के तौर पर नहीं बल्कि "रणनीतिक टोह" के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा "दोनों पक्ष एक-दूसरे की अंतिम सीमा को समझने, अपनी 'रेड लाइन्स' को साफ करने और यह परखने की कोशिश कर रहे हैं कि स्थिर तनाव कब तक बना रह सकता है और कब वह टूटकर टकराव में बदल सकता है।" उन्होंने आगे कहा "इसका मकसद मुकाबले को पूरी तरह से खत्म करना नहीं है, बल्कि हालात को समझना, गति को नियंत्रित करना और ऐसे हालात में लड़ने से बचना है जो अपने पक्ष में न हों।"यानि ये विचार की डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग दोनों ही अब इस बात को जान गये हैं कि अमेरिका या चीन, सिर्फ एक देश शक्तिशाली नहीं रह सकता। इस कोशिश में दोनों ही सफल नहीं हो सकते हैं तो क्यों ना बीच का रास्ता निकाल लिया जाए। शी जिनपिंग फिलहाल के लिए शायद ये चाह रहे होंगे कि चीन के ऊपर वर्चस्ववादी शक्ति होना का ठप्पा फिलहाल ना लगे बल्कि अमेरिका उसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा एकमात्र देश मान ले।
इसीलिए सवाल ये है कि डोनाल्ड ट्रंप के पिछले डेढ़ वर्षों के दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन को लेकर उनकी नीति और अब बीजिंग दौरा क्या इस बात की पुष्टि है कि G2 (ग्रुप ऑफ टू) का निर्माण हो चुका है। क्या इसका मतलब है कि दुनिया की दूसरी ताकतें जैसे भारत, रूस, फ्रांस या फिर यूरोपीय संघ के लिए वैश्विक शक्ति के रेस में कोई जगह नहीं है? क्या दुनिया के दूसरे देशों को या तो चीन या अमेरिका के बीच किसी एक के छाते के नीचे रहने आना होगा और क्या भारत या रूस जैसे देश इसे बर्दाश्त करेंगे? खासकर रूस जो एक वक्त अमेरिका के सामने दूसरी शक्ति बनकर खड़ा था।











