ये ऑर्डर फ्रांस और आठ एक्सपोर्ट कस्टमर्स के बीच बंटे हुए हैं। मिस्र, कतर, भारत, ग्रीस, क्रोएशिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया और सर्बिया। UAE के साथ 80 जेट का कॉन्ट्रैक्ट डसॉल्ट के इतिहास में सबसे बड़ा एक्सपोर्ट डील है। वहीं भारत अब 114 राफेल खरीदने के लिए फ्रांस के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन करने वाला है। राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट के सामने अब समस्या ऑर्डर की नहीं बल्कि समय पर डिलीवरी की है। इसीलिए सवाल ये है कि आखिर अमेरिकी एफ-35 के सामने राफेल को ज्यादा खरीददार क्यों मिल रहे हैं?
एफ-35 पर अमेरिका की शर्तें, राफेल पर संप्रभू अधिकार
F-35 खरीदने वाले देशों को सॉफ्टवेयर, स्पेयर पार्ट्स और मिशन-डेटा फाइलें अमेरिका के कंट्रोल वाली सप्लाई चेन पर निर्भर होना पड़ता है और जिसके अपग्रेड और हथियारों का इंटीग्रेशन अमेरिकी कानून और कांग्रेस की मंजूरी पर निर्भर है। अमेरिका एफ-35 को जियो पॉलिटिकल हथियार की तरह इस्तेमाल करता हैलेकिन राफेल के साथ ऐसा नहीं है। फ्रांस बिना शर्त राफेल बेचता है और कोई पाबंदी नहीं होती है। उसके इस्तेमाल पर फ्रांस की कोई दखलअंदाजी नहीं होती है। जैसे सर्बिया... रूस का करीबी साझेदार होने पर भी उसने राफेल खरीदने के लिए फ्रांस के साथ डील साइन किया है।
F-35 के मुकाबले राफेल का लगातार अपग्रेडेशन
इसके अलावा डसॉल्ट राफेल को लगातार एडवांस और आधुनिक लड़ाई के हिसाब से ढालता रहता है। मौजूदा F4 स्टैंडर्ड में नेटवर्क-बेस्ड लड़ाई क्षमता, नया RBE2-XG रडार, स्कॉर्पियन हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले और बेहतर कनेक्टिविटी जैसी खूबियां जोड़ी गई हैं।इसके अलावा राफेल के F5 वैरिएंट में ड्रोन 'लॉयल विंगमैन' जोड़ने पर काम चल रहा है। वहीं इसमें स्टील्थ एयरक्राफ्ट का पता लगाने में मदद करने वाला गैलियम-नाइट्राइड रडार लगाया जाएगा। वहीं फ्रांस की अगली पीढ़ी की हाइपरसोनिक न्यूक्लियर मिसाइल से हमला करने वाली क्षमता भी इसमें होगी। फ्रांसीसी वायु सेना को उम्मीद है कि यह मॉडल 2050 के दशक तक सेवा में रहेगा। इसीलिए राफेल को लेकर बदलते युद्ध के माहौल में भी विश्वसनीयता बनी रहती है।











