उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में देवदार के घने जंगलों और जटा गंगा नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी तीर्थस्थल है। यह स्थान भगवान शिव को समर्पित लगभग 124 छोटे-बड़े पत्थरों से बने मंदिरों का समूह है, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है
प्रमुख विशेषताएँ और जानकारी:
धार्मिक महत्व: इसे पुराणों में 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक (आठवां ज्योतिर्लिंग - 'नागेशं दारुकावने') के रूप में भी पूजा जाता है I
स्थापत्य कला: ये मंदिर अपनी अद्भुत और प्राचीन वास्तु-कला (नागर शैली) के लिए जाने जाते हैं, जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में हैं I
प्रमुख मंदिर: इस पूरे समूह में जागेश्वर महादेव मंदिर, महामृत्युंजय मंदिर, कालिका मंदिर, और नवदुर्गा मंदिर मुख्य रूप से शामिल है I
प्राचीन वास्तुकला: यहाँ के मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराने हैं और 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण' (ASI) के अनुसार इनका निर्माण गुप्त काल के दौरान हुआ था I
महामृत्युंजय मंदिर : इस समूह का सबसे बड़ा और सबसे प्राचीन मंदिर 'महामृत्युंजय महादेव' है। मान्यता है कि यहीं पर महामृत्युंजय मंत्र प्रकट हुआ था I
पौराणिक मान्यता : स्कंद पुराण और शिव पुराण के अनुसार, यहीं पर भगवान शिव ने 'बाल या तरुण रूप' में तपस्या की थी और यहीं से पहली बार शिवलिंग के रूप में शिव पूजा आरंभ हुई I
धार्मिक महत्व: कुछ स्थानीय मान्यताओं और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, जागेश्वर धाम को बारह ज्योतिर्लिंगों का उद्गम स्थल भी माना जाता है I
उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरी राजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल।
बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग 250 छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी shilaon से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है। प्रमुख मंदिरमृत्युंजय मंदिर: यह इस पूरे समूह का सबसे प्राचीन मंदिर है।दंडेश्वर मंदिर: यह समूह का सबसे बड़ा मंदिर है।
जागेश्वर मंदिर : मुख्य मंदिर में शिवलिंग दो भागों में विभाजित है, जिसमें बड़े भाग में शिव और छोटे भाग में माता पार्वती विराजमान हैं।
जागेश्वर को पुराणों में हाटकेश्वर और भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूण के नाम से जाना जाता है। पतित पावन जटागंगा के तट पर समुद्रतल से लगभग 6200 फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। कुदरत ने इस स्थल पर अपने अनमोल खजाने से खूबसूरती जी भर कर लुटाई है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर संसार के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगोंमें से एक है।
पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएं पूरी नहीं होती केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।
नैनीताल से दूरी और यात्रा
- दूरी: जागेश्वर धाम, नैनीताल से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 100-101 किलोमीटर दूर स्थित है।
- यात्रा मार्ग: नैनीताल से जागेश्वर जाने के लिए अल्मोड़ा मुख्य शहर से होकर जाना पड़ता है। नैनीताल से यहाँ पहुँचने में करीब 3 से 3.5 घंटे का समय लगता है।











