भोपाल में हर साल सैकड़ों लोगों की सड़क पर मौत, लापरवाही बन रही काल

भोपाल में हर साल सैकड़ों लोगों की सड़क पर मौत, लापरवाही बन रही काल
"अरे ओ खां..! जरा संभलकर, घर पर कोई इंतजार कर रहा है।" भोपाल के व्यस्त बोर्ड ऑफिस या रोशनपुरा चौराहे पर गूंजती यह आवाज किसी लाउडस्पीकर की चेतावनी नहीं, बल्कि उस दर्दनाक सच्चाई का आईना है जिससे हम रोज रूबरू होते हैं, लेकिन अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं। शहर के विभिन्न चौराहों पर रोजाना दिखते दृश्य बताते हैं कि सड़क पर हमारी एक छोटी-सी लापरवाही किसी परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ सकती है।
सड़क हादसे अब महज दुर्घटनाएं नहीं रहे, वे एक मौन महामारी का रूप ले चुके हैं। देश में हर तीन मिनट में एक व्यक्ति सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवा रहा है। मध्य प्रदेश में प्रतिदिन लगभग 50 लोगों की मौत सड़क हादसों में हो रही है, जबकि राजधानी भोपाल में भी हर वर्ष औसतन 250 से 300 लोग असमय काल के गाल में समा जाते हैं और 1000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं। इन आंकड़ों के पीछे केवल संख्याएं नहीं, बल्कि टूटते परिवार, अनाथ होते बच्चे और जीवनभर का दर्द छिपा है।
‘पुलिस नहीं तो नियम नहीं’ की सोच सबसे बड़ा खतरा
यातायात विशेषज्ञों के अनुसार भोपाल में सबसे गंभीर समस्या नियमों की जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि उन्हें नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति है। बीआरटीएस कॉरिडोर (BRTS Corridor) के हटने के बाद चौड़े हुए रास्तों पर वाहनों की तेज रफ्तार और होशंगाबाद रोड, कोलार रोड या अयोध्या बायपास जैसे व्यस्त मार्गों पर नियमों की अनदेखी आम बात हो गई है। आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि नियमों का पालन करवाना केवल पुलिस का दायित्व है। परिणामस्वरूप रेड लाइट जंप करना, रॉन्ग साइड वाहन चलाना, हेलमेट या सीट बेल्ट की अनदेखी करना सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है।
विडंबना यह है कि नियम तोड़ने के बाद अपराधबोध नहीं होता, बल्कि कई लोगों को यह एक तरह की ‘चालाकी’ या ‘जीत’ प्रतीत होती है। यही मानसिकता भोपाल की सड़कों को असुरक्षित बना रही है।
अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जरूरी
लोकतंत्र में प्रशासनिक कमियों, सड़कों के गड्ढों, खराब स्ट्रीट लाइट्स और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन क्या व्यवस्था की कमियों को आधार बनाकर नियम तोड़ना उचित ठहराया जा सकता है? यदि भोपाल की सड़कों पर हर व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की बात करे और कर्तव्यों को भूल जाए, तो दुर्घटनाएं कभी नहीं रुक सकतीं।
केवल चालान नहीं, बेहतर प्रबंधन भी जरूरी
भोपाल की सड़क सुरक्षा का समाधान केवल चालान काटने, आईटीएमएस (ITMS) कैमरों के ई-चालान या दंड में नहीं, बल्कि जनजागरूकता, प्रभावी ट्रैफिक प्रबंधन और नागरिक सहभागिता में छिपा है। पुलिस और नगर निगम को जहां 'ब्लैक स्पॉट्स' (दुर्घटना संभावित क्षेत्रों) को सुधारने, यातायात प्रबंधन और शिक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा, वहीं भोपाल के नागरिकों को भी यह समझना होगा कि यातायात नियम सरकार या पुलिस के लिए नहीं, बल्कि स्वयं उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
> सवाल केवल इतना है: क्या हम कुछ सेकंड बचाने की जल्दबाजी में किसी घर का चिराग बुझाने या खुद की जान जोखिम में डालने का सौदा करना चाहते हैं?
अगली बार जब आप भोपाल की सड़कों पर रेड लाइट पार करने, गलत दिशा में वाहन चलाने या हेलमेट-सीट बेल्ट को नजरअंदाज करने का सोचें, तो बस एक बार मुस्कुराकर याद कर लीजिए, "घर पर कोई मेरा इंतजार कर रहा है।"
राजकुमार जैन, यातायात प्रबंधन विशेषज्ञ 
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