-अपना देश… अपनी भाषा… अपना स्वाभिमान
ब्रिटिश राज के चंगुल से स्वतंत्र हुए हमें आठ दशक होने को आ रहे हैं। लेकिन हर साल जब स्वतंत्रता का यह पावन पर्व आता है, तो एक यक्ष प्रश्न हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान के सामने खड़ा हो जाता है। हम इस ऐतिहासिक दिन पर एक-दूसरे को बधाई कैसे देना चाहते हैं?
"हैप्पी इंडिपेंडेंस डे" या “स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ”?
>भारत हमारा स्वाधीन राष्ट्र है, स्वतंत्रता दिवस हमारा सर्वोच्च राष्ट्रीय पर्व है और हिंदी (तथा हमारी सभी भारतीय भाषाएँ) हमारी सांस्कृतिक आत्मा है। फिर भी, अपने ही देशवासियों को आज़ादी की बधाई अंग्रेजी में देने की यह होड़ आखिर किस बात का प्रतीक है?
इतिहास साक्षी है कि हमने लगभग दो शताब्दियों तक अंग्रेजों के क्रूर शासन का दंश झेला। 1947 में हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल कर ली और गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंका, लेकिन अफ़सोस कि भाषाई और मानसिक गुलामी के अदृश्य धागे आज भी हमारे चिंतन को जकड़े हुए हैं। जब कोई भारतीय अपने ही भाई-बहन को स्वतंत्रता दिवस पर अंग्रेजी में बधाई देता है, तो ऐसा लगता है कि औपनिवेशिक स्वामीभक्ति का भाव आज भी हमारी सोच पर हावी है।
दुनिया के अन्य सशक्त और स्वाभिमानी देशों के उदाहरण हमारे लिए एक बड़ी सीख हैं:
• फ्रांस: फ्रांसीसी नागरिक अपने राष्ट्रीय दिवस (Bastille Day) पर केवल "जॉयक्स 14 जुइलेट" (Joyeux 14 Juillet) कहते हैं। वे किसी भी कीमत पर अंग्रेजी या अन्य भाषा के प्रभुत्व को अपनी राष्ट्रीय पहचान पर हावी नहीं होने देते।
• रूस: विजय दिवस (Victory Day) हो या रूस दिवस, रूसी समाज अपनी बधाई केवल और केवल अपनी मातृभाषा रूसी ("स ड्नेम पोबेडी") में देता है। उनके लिए भाषा ही उनकी संप्रभुता का मुख्य स्तंभ है।
• चीन और जापान: इन दोनों देशों ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिकता और आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए अंग्रेजी का पिछलग्गू होना ज़रूरी नहीं है। वे अपने हर राष्ट्रीय उत्सव को पूरी निष्ठा के साथ अपनी ही भाषा में मनाते हैं।
• जर्मनी: जर्मन अपनी एकजुटता दिवस (Tag der Deutschen Einheit) पर अपनी भाषा के स्वाभिमान को सर्वोपरि रखते हैं।
ज्ञान या वैश्विक संवाद के लिए कोई नई भाषा सीखना गलत नहीं है; अंग्रेजी का व्यावहारिक ज्ञान होना भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब अंग्रेजी को अभिजात्यता, ज्ञान और सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय मान लिया जाता है और अपनी राष्ट्रभाषा या मातृभाषा को हीन भावना से देखा जाता है। दुनिया का कोई भी देश दूसरों की भाषा को वैशाखी बनाकर महान नहीं बना।
> भाषा केवल संवाद का साधन नहीं होती, वह हमारी संस्कृति, हमारे संस्कारों और हमारी संप्रभुता की वाहक होती है। जब हम अपनी भाषा छोड़ते हैं, तो हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं।
इस आज़ादी के पर्व पर आइए एक और आज़ादी का संकल्प लें, मानसिक गुलामी से आज़ादी। अपनी भाषा में सोचने, अभिव्यक्ति करने और गर्व महसूस करने की आज़ादी।
आइए, इस बार औपनिवेशिक मानसिकता का त्याग करें और अपनी आज़ादी के सबसे बड़े पर्व पर एक-दूसरे को पूरी आत्मीयता, सम्मान और गर्व के साथ कहें: *"स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!"
-राजकुमार जैन स्वतंत्र चिंतक एवं वरिष्ठ स्तंभकार
